पटना: “दूसरों पर वार, खुद का बढ़ रहा परिवार।” राजनीति में अधिकांश नेता इसी ढर्रे पर चलते हैं। उनके परिवार के बारे में पूछने पर तमाम तरह के तर्क और दूसरों से अंतर गढ़ देते हैं। बिहार भी इसमें किसी से पीछे नहीं, बल्कि आगे है। कोई ऐसी पार्टी नहीं है, जहां प्रमुख नेता अपने बेटा, दामाद या रिश्तेदार को टिकट दिलवाने में न लगा रहता हो। यह पार्टियों के फैसलों और सरकार की कार्यशैली को भी प्रभावित करता है। इससे जनता के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और परिवार के लिए जुगाड़ में नेता पूरी ताकत झोंक देते हैं।
एक तरफ लालू प्रसाद यादव का पूरा कुनबा राजनीति में है। वहीं दूसरे आरोप लगाते हैं कि वे अपने परिवार के विकास तक सीमित हैं। दूसरी तरफ एनडीए में भी जीतनराम मांझी और मंत्री अशोक चौधरी के दामादों तथा चिराग पासवान के बहनोई को विभिन्न आयोग और बोर्ड में मनोनित हैं। तेजस्वी इस मुद्दे को कई बार उठा चुके हैं।
आरएलएम प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को छोड़ दें तो गिने-चुने नाम ही बचते हैं, जिनके पारिवार के सदस्य या रिश्तेदार राजनीति में नहीं हैं। पारिवारिक सदस्य एक-दूसरे के लिए राजनीतिक सीढ़ी का काम करते हैं। इससे नए चेहरों का अभाव दिखने लगता है और विचारधारा शून्य हो जाती है। बिहार की सियासत में ऐसे नेताओं की कमी है जो पूरी तरह अपने दम पर राजनीति की पहली पंक्ति तक पहुंचे हों।
राजनीतिक विश्लेषक की राय
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन सिंह ने “आखिर नेता का बेटा नेता बने तो उसमें बुराई क्या है?” के सवाल पर कहा कि जब जज का बेटा जज, कलाकार के बेटा कलाकार बन सकता है तो नेता का बेटा नेता क्यों नहीं बन सकता। किसी पेशे का वातावरण और माहौल बचपन से ही बच्चों के जेहन में बैठ जाता है। उनके पास संसाधन, संपर्क और अनुभव की सहज पूंजी होती है। यही वजह है कि बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव, चिराग पासवान और सम्राट चौधरी जैसे नेता नीतीश कुमार के बाद “कौन?” के सवाल का जवाब देने की होड़ में हैं।
वरिष्ठ पत्रकार आलोक शुक्ला ने कहा, राजनीति सिर्फ पेशा नहीं
इस संबंध में अमर उजाला सहित कई अखबारों के संपादक रह चुके आलोक शुक्ला का कहना है कि राजनीति सिर्फ पेशा नहीं है। यह जनता की आकांक्षाओं का आइना है। इसमें यदि नये लोग नहीं आएंगे तो फिर नया उत्साह नहीं आ सकता। नई सोच नहीं पैदा हो सकती। इससे विकास अवरूद्ध होगा। कुछ लोगों तक ही यह राजनीति की धूरी सिमट कर रह जाएगी।
जे.पी. आंदोलन से निकले समाजसेवा में, परिवार की सेवा में लग गये
बिहार की राजनीति को देखें तो यहां आज अधिकांश बड़े नेता जे.पी. आंदोलन से निकले हुए हैं। वे खुद तो परिवार के बल पर नहीं निकले, आंदोलन की चिराग से निकलकर जन सेवा की भावना से आगे बढ़े, लेकिन परिवार के मोह में फंस गये और आगे परिवार को आगे बढ़ाते रहे। इसकी सबसे मजबूत मिसाल आरजेडी के लालू यादव का परिवार है। लालू यादव मुख्यमंत्री बनने के बाद पूर परिवार को राजनीति में ला दिया।
लालू ने जैसे जेल जाने की नौबत आयी पत्नी को बना दिया सीएम
मुख्यमंत्री रहते जब घोटाले में जेल जाने की नौबत आयी तो उससे पहले कई नेता मुख्यमंत्री बनने की लालसा मन में पाल लिये थे, लेकिन लालू ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। उस समय तक वे राजनीति का एबीसीडी तक नहीं जानती थीं। वर्तमान में बड़ी बेटी मीसा भारती राज्यसभा से लेकर लोकसभा तक सांसद बन चुकी हैं। वहीं रोहिणी आचार्या को लोकसभा का टिकट दिया गया, भले ही जीत न सकीं। लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव दो बार विधायक और मंत्री रहे। छोटे बेटे तेजस्वी यादव पार्टी के वास्तविक सर्वेसर्वा बन चुके हैं। यही नहीं लालू के दामाद भी बड़े राजनीतिक घरानों से आते हैं। कोई हरियाणा में मंत्री के बेटे हैं तो कोई मुलायम सिंह यादव के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इससे लालू परिवार की ताकत.और बढ़ जाती है।
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रामविलास का कुनबा भी कम नहीं
रामविलास पासवान ने भी अपनी जाति को आगे बढ़ाने के लिए राजनीति शुरु की। समाज में अपनी बिरादरी के लोगों के हक की लड़ाई लड़ने में आगे रहे, लेकिन राजनीति में आगे बढ़ाने की बात आयी तो अपने परिवार और रिश्तेदारों को ही आगे बढ़ाने का काम किया। उन्होंने अपने भाइयों और बेटों को आगे बढ़ाया। भाई पशुपति कुमार पारस बिहार में हुंकार भर रहे हैं। वहीं बेटे चिराग पासवान खुद को नरेन्द्र मोदी का हनुमान कहते नहीं थकते। बिहार में अपनी जड़े जमा चुके हैं। वहीं भतीजे प्रिंस पासवान जैसे नाम भी इस परिवार से संसद तक पहुंचे। वहीं राम विलास पासवान के छोटे भाई रामचंद्र पासवान भी समस्तीपुर से सांसद रह चुके थे, जिनका 2019 में निधन हो गया। वहीं चिराग की बहन के पति अरुण भारती जमुई से सांसद हैं।
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नीतीश ने मांझी को आगे बढ़ाया, मांझी ने अपने परिवार को
जीतनराम मांझी दबे-कुचले समाज की राजनीति करके अपने विधानसभा तक ही सीमित रहते थे, लेकिन नीतीश कुमार ने एक बार सीएम बनाकर उन्हें प्रदेश स्तरीय नेता बना दिया। इसके बाद जीतनराम के भी मन में गुब्बार फुटने लगा और उन्होंने खुद की पार्टी “हम” बना ली। इसके बाद परिवार को राजनीति में उतारने का सिलसिला शुरू किया। समधन ज्योति मांझी विधायक बनीं। बेटा संतोष सुमन विधान परिषद और मंत्री बने। अब बहु दीपा मांझी भी विधायक हैं।
सम्राट के लिए विचार नहीं, परिवार रखता है मायने
बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते हैं, जिसकी तीन पीढ़ियाँ राजनीति में सक्रिय रही हैं। उनके पिता शकुनी चौधर एक अनुभवी राजनेता थे और बिहार की राजनीति में गहरी पैठ थी। वे समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से थे और खगड़िया से लोकसभा सांसद भी रहे। इन्होंने कई बार पार्टियाँ बदलीं, जिसमें कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), और जनता दल-यूनाइटेड (जेडी-यू) शामिल हैं। राबड़ी देवी की सरकार में सम्राट कृषि मंत्री बने, लेकिन कम उम्रक को लेकर विवाद खड़ा हो गया। सम्राट चौधरी की माँ पार्वती देवी, तारापुर निर्वाचन क्षेत्र से विधायक थीं। सम्राट चौधरी के भाई रोहित चौधरी भी राजनीति में हैं। अब अगली पीढ़ी यानी सम्राट के भाई और बेटा रूद्रांश राजनीति में कदम बढ़ा रहे हैं। वहीं महावीर चौधरी कांग्रेस के बड़े नेता रहे। उनके बेटे अशोक चौधरी ने पिता की विरासत संभाली और अब जेडीयू में मंत्री हैं। अशोक की बेटी शांभवी सांसद हैं और दामाद सायन कुणाल भी राजनीति में सक्रिय हैं
रामसेवक सहित कई बड़े नेताओं ने परिवार व रिश्तेदारों को लाया राजनीति में
राम सेवक हजारी परिवार भी बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके बेटे महेश्वर हजारी, बहू मंजू हजारी, पोते तक राजनीतिक मैदान में सक्रिय हैं। बिहार के बाहुबली नेता सूरजभान सिंह का परिवार राजनीति में सक्रिय है। हाल ही में एक 33 साल पुराने मामले में उन्हें एक साल की सजा सुनाई गई, हालांकि उन्हें जमानत मिल गई। उनकी पत्नी वीणा देवी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के टिकट पर मुंगेर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। वह अपने पति के लिए चुनाव प्रचार भी करती हैं। भाई चंदन सिंह नवादा से लोजपा के सांसद हैं। जगदानंद सिंह के बेटे सुधाकर सिंह विधायक बने।उनके दूसरे बेटे अजीत सिंह भी राजनीति में हैं। नवादा के राजबल्लभ यादव, उनकी पत्नी विभा यादव, भाई अशोक यादव सभी राजनीति में हैं। वहीं मोकामा की राजनीति के बात करें तो दिलीप सिंह और अनंत सिंह के परिवार के ईर्द-गिर्द यहां की राजनीति घूमती रही है। बिहार में आनंद मोहन को सजा हो चुकी है। इसके बावजूद उनकी राजनीतिक पकड़ मजबूत हैं और पत्नी व बेटे चुनाव लड़ते रहते हैं।
बिना परिवार के सहारे भी राजनीति में बनायी मजबूत पकड़
इन पारिवारिक विरासत को संभालने वाले नेताओं के अतिरिक्त अपने दम पर चुनाव लड़ने और राजनीति में छा जाने वाले नेताओं की भी कमी नहीं है। जेडीयू के लल्लन सिंह, भाजपा के गिरिराज सिंह, मुकेश सहनी या नित्यानंद राय ने परिवार के बिना अपनी जगह राजनीति में बनायी और जनता के बीच मजबूत पकड़ बनाकर रखे हुए हैं। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के पहले भी कोई पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी।



