नई दिल्ली: ईद का अर्थ है खुशी, और ईद मिलादुन्नबी पैगंबर हजरत मोहम्मद (स.अ.व.) के जन्मदिन की खुशी का प्रतीक है। इस दिन को मुस्लिम समुदाय, खासकर भारतीय उपमहाद्वीप में, उत्साह के साथ मनाते हैं। यह उत्सव जुलूसों, नात पढ़ने और धार्मिक आयोजनों के साथ मनाया जाता है। लेकिन इस्लाम में दो मुख्य ईदें ईद-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा ही आधिकारिक तौर पर नमाज के साथ मनाई जाती हैं। ईद मिलादुन्नबी को “ईद” कहने के बावजूद इसकी नमाज नहीं पढ़ी जाती। आइए जानते हैं इसका कारण।
दो ईदों और ईद मिलादुन्नबी में अंतर
इस्लाम में ईद-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा को पैगंबर के समय से मनाया जाता रहा है और इनके लिए विशेष नमाज का हुक्म कुरान और हदीस में मिलता है। लेकिन ईद मिलादुन्नबी का जश्न पैगंबर की वफात के बाद, खासकर 10वीं शताब्दी में फातिमी खिलाफत द्वारा शुरू किया गया। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह परंपरा बाद में शामिल की गई, जिसे अहले हदीस और सलफी समूह “बिदअत” (नवाचार) मानते हैं। दूसरी ओर, बरेलवी और सुन्नी समुदाय इसे पैगंबर के प्रति प्रेम और खुशी के प्रतीक के रूप में मनाते हैं।
नमाज का अभाव क्यों?
ईद मिलादुन्नबी को लेकर कुरान या हदीस में किसी विशेष नमाज का जिक्र नहीं है। पैगंबर और उनके सहाबा ने इस दिन को उत्सव के रूप में नहीं मनाया, इसलिए इसे शरियत में आधिकारिक ईद का दर्जा नहीं मिला। यह दिन खुशी और मोहब्बत जताने का अवसर है, लेकिन इसकी कोई अनिवार्य धार्मिक नमाज नहीं है। इसकी तुलना में, ईद-उल-फित्र और अजहा की नमाजें वाजिब हैं। इसीलिए ईद मिलादुन्नबी को केवल उत्सव के रूप में मनाया जाता है, न कि नमाज के साथ।
उत्सव का प्रचलन और विवाद
भारतीय उपमहाद्वीप, मिस्र और अन्य क्षेत्रों में यह ईद लोकप्रिय है। ऐसे में 1207 में इराक के एरबिल में इसे पहली बार सार्वजनिक उत्सव के रूप में मनाया गया। लेकिन कुछ विद्वान इसे गैर-इस्लामी मानते हैं, जिसके चलते इस पर मतभेद रहते हैं। फिर भी, यह दिन पैगंबर के जीवन और शिक्षाओं को याद करने का अवसर देता है।



