नई दिल्ली: चुनाव आयोग की मतदाता सूची विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद पर सियासी संग्राम चरम पर है। बिहार विधानसभा के साथ देश की संसद की कार्यवाही ठप है। राजग इस कवायद के पक्ष में है तो विपक्षी महागठबंधन इसके खिलाफ आंदोलनरत है। ऐसे समय में जदयू के बांका के सांसद गिरिधारी यादव ने विपक्ष के सुर में सुर मिलाते हुए चुनाव आयोग की इस कवायद को तुगलकी फरमान करार देते हुए दो टूक शब्दों में कहा है कि उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस मामले में उनकी पार्टी का क्या रुख है।
संसद भवन परिसर में एसआईआर के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलते हुए यादव ने कहा कि आयोग को बिहार का इतिहास-भूगोल नहीं पता। सांसद होते हुए भी जब उन्हें आवश्यक दस्तावेज जुटाने में दस दिन लग गए तो दूसरों का क्या होगा? उन्होंने कहा कि उनका बेटा अमेरिका में रहता है। इसी तरह बिहार के लाखों लोग दूसरे राज्यों में है। ये लोग इतने कम समय में कैसे दस्तावेज जुटाएंगे। कैसे बिहार पहुंच कर फार्म पर हस्ताक्षर करेंगे? उन्होंने कहा कि अगर यह जरूरी था तो इसे पहले क्यों नहीं शुरू किया गया? ऐन चुनाव के समय इस कवायद का क्या मतलब है?
फर्क नहीं पड़ता पार्टी क्या सोचती है?
सांसद यादव यहीं नहीं रुके। जब उन्हें इस संबंध में उनकी पार्टी जदयू के रुख की याद दिलाई गई तो उन्होंने कहा कि बतौर सांसद मुझे सच बोलना चाहिए। अगर सांसद रहते सच नहीं बोल पाया तो यह पद किस काम का? मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस मुद्दे पर पार्टी क्या सोचती है या उसका क्या रुख है। मैं सच और अपना अनुभव साझा कर रहा हूं।
पाला बदलने की चर्चा क्यों?
दरअसल इस मुद्दे पर विधानसभा में बुधवार को ही नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार के बीच तीखी नोकझोंक हुई है। नीतीश ने इस कवायद का समर्थन किया है। इसी बीच उन्हीं की पार्टी के सांसद का विपक्ष के सुर में सुर मिला कर एसआईआर का विरोध करना यह बताता है कि इस मुद्दे पर जदयू में सबकुछ ठीक ठाक नहीं है। फिर सवाल सांसद के मोर्चा खोलने के समय का भी है। इस मुद्दे पर सियासत चरम पर है। ऐसे में पार्टी की नीति और सोच के विपरीत सांसद यादव की टिप्पणी के बाद चर्चाओं का बाजार गर्म है।



