नौकरशाही से मोह छूटा, नौकरशाहों को चलाने नेतागीरी की पकड़ी राह

अपने देश में बहुत से नौकरशाह हुए हैं, जिनका जब नौकरशाही से मोह भंग हुआ तो उनने राजनीति में प्रवेश किया। कुछ ने कामयाबी हासिल की और कुछ हासिए पर चले गए।

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पटना: जिस प्रशासनिक सेवा का ख्वाब लेकर लाखों लोग हर साल दिन-रात एक कर देते हैं, उसी प्रशासनिक सेवा के कई अधिकारियों का राजनीति की ओर झुकाव दिखता रहा है। ऐसे कई आईएएस या आईपीएस हैं, जिन्होंने वीआरस लेकर राजनीति में प्रवेश किया, तो कई सेवानिवृत होने के बाद अपनी राजनीति पाली का आगाज किया है। कुछ ब्यूरोक्रैट्स ऐसे भी हैं, जिन्होंने खाकी उतार कर खादी धारण कर लिया। इसमें बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आरके सिंह, पीएल पुनिया, यशवंत सिन्हा, मीरा कुमार से लेकर अजित जोगी तक ऐसे कई दिग्गज हैं। इन लोगों ने राजनीति की दुनिया में प्रशासनिक सेवा छोड़कर प्रवेश लिया। दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश ब्यूरोक्रैट्स ने हमेशा से राजनीतिक पारी के लिए कांग्रेस या बीजेपी में ज्यादा रुचि दिखाई है।
इस स्टोरी के माध्यम से जानते है बिहार कितने ब्यूरोक्रैट्स ने खाकी से खादी तक का सफर तय किया है। विगत वर्षो में बिहार से कई अफसर खाकी वर्दी  को छोड़कर खादी का कुर्ता पहनकर बिहार विधानसभा के सदस्य बन गये हैं। खाकी से खादी तक के सफर की बात करें तो सूची में कई अफसर हैं। इनमें सुनील कुमार पूर्व डीजी से मंत्री बने। गुप्तेश्वर पांडेय और डीपी ओझा को राजनीति में सफलता नहीं मिली। कई पूर्व पुलिस अधिकारी राजनीति में सक्रिय हैं। हाल ही में बिहार में डीआईजी रहे शिवदीप लांडे ने वीआरएस लेकर अपनी खुद कि पार्टी बनाई है हिंद सेना जिसके बैनर तले वो बिहार में लोगों से मिलते- जुलते है आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार भी हो सकते है।

बिहार के राजनीति में सक्रिय अफसर
पूर्व पुलिस महानिदेशक सुनील कुमार बिहार राज्य के एक राजनेता है। वह बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू में शामिल हो गए थे। वह बिहार के भोरे सीट से विधायक है। सुनील कुमार ने जब पहली बार विधानसभा चुनाव जीता तो उन्हें नीतीश कुमार ने मंत्रालय की बागड़ोर थमा दी थी।
सुनील कुमार को नीतीश सरकार में मद्य निषेध व निबंधन विभाग का मंत्री बनाया गया था। जब बिहार में नीतीश सरकार कि सियासी उलटफेर हुआ और महागठबंधन की सरकार बिहार में बनी तब भी सुनील कुमार के पास मद्य निषेध विभाग ही रहा। वहीं एनडीए की नयी सरकार सूबे में बनने के बाद जब अब तीसरी बार उन्हें मंत्री बनाया गया तो इसबार उन्हें शिक्षा विभाग का जिम्मा थमाया गया है।

गुप्तेश्वर पांडेय ( पूर्व डीजीपी बिहार )
बिहार के राजनीति में खाकी से खादी तक के सफर में इस नाम कि चर्चा एक समय जोर-शोर से हो रही थी। जब गुप्तेश्वर पाण्डेय ने अपना कार्यकाल पूरा होने से पांच महीना पहले 22 सितंबर 2020 को ही बिहार पुलिस के डीजीपी पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लिया था। उसके बाद राजनीति में प्रवेश किया मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कि पार्टी जदयू कि सदस्यता ली उनकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के पीछे का कारण था बक्सर विधानसभा से चुनाव लड़ना। हालांकि, उन्हें पार्टी के तरफ से टिकट नहीं मिला और वे राजनीति से भी खुद कों मुक्त कर अध्यात्म कि तरफ रुख किया।

डीपी ओझा ( पूर्व, डीजीपी बिहार )
इसी कड़ी में बिहार के पूर्व डीजीपी रहे डीपी ओझा ने भी बेगूसराय से राजनीति में किस्मत आजमाने कि कोशिश थी परंतु चुनाव जीत नहीं पाए। डीपी ओझा बिहार के काफी कडक़ अधिकारियों में गिने जाते थे। अपने कार्यकाल में उन्होंने लालू प्रसाद यादव और मोहम्मद शहाबुद्दीन जैसे प्रभावशाली नेताओं के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था। वर्ष 2004 में वो बेगूसराय से निर्दलीय लोकसभा चुनाव लड़े। डीपी ओझा को हार का सामना करना पड़ा। 5 दिसंबर 2024 की रात लंबी बीमारी के बाद उनका पटना निधन हो गया।

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