नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा लाए गए एक विवादास्पद विधेयक पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को विपक्षी दलों ने एक बड़ा झटका दिया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बाद अब समाजवादी पार्टी (सपा) ने भी इस जेपीसी का बहिष्कार करने का फैसला किया है। यह विधेयक प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को 30 दिन की गिरफ्तारी की स्थिति में उनके पद से बर्खास्त करने का प्रावधान करता है।
टीएमसी और सपा का बहिष्कार
टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इस विधेयक को “असंवैधानिक” बताते हुए जेपीसी को “नाटक” करार दिया। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से जेपीसी की प्रासंगिकता खत्म हो गई है और सरकारें इसका इस्तेमाल सिर्फ राजनीतिक उद्देश्यों के लिए कर रही हैं। उन्होंने हर्षद मेहता घोटाले और बोफोर्स मामले में बनी जेपीसी का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले इन समितियों का मकसद जवाबदेही तय करना होता था, लेकिन अब यह केवल एक औपचारिकता बन कर रह गई है।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी टीएमसी का समर्थन करते हुए कहा कि विधेयक का मूल विचार ही गलत है। उन्होंने कहा कि जब झूठे मुकदमे दर्ज किए जा सकते हैं, तो इस तरह के विधेयक का कोई औचित्य नहीं है। अखिलेश ने अपने नेताओं, जैसे आजम खान, रामाकांत यादव और इरफान सोलंकी के जेल जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि उन पर भी झूठे मुकदमे लगाए गए थे।
विधेयक पर अखिलेश यादव की आपत्ति
अखिलेश यादव ने इस विधेयक को भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है और राज्य के मुख्यमंत्री अपने राज्यों में दर्ज आपराधिक मामलों को वापस ले सकते हैं। इस विधेयक के बाद केंद्र सिर्फ उन्हीं मामलों में दखल दे पाएगा जो सीबीआई या ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों द्वारा दर्ज किए गए हैं, जो राज्यों के अधिकारों का हनन है।
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विपक्षी खेमे में हलचल
टीएमसी के बहिष्कार की उम्मीद पहले से थी, लेकिन सपा के अचानक इस फैसले ने विपक्षी खेमे में असमंजस पैदा कर दिया है। कई विपक्षी दलों का मानना है कि संसदीय समितियों में होने वाली बहसें अदालती सुनवाई और जनमत निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सपा के इस कदम ने विपक्षी एकजुटता को कमजोर किया है। अब कांग्रेस पर भी जेपीसी में शामिल होने को लेकर दबाव बढ़ रहा है। कांग्रेस अभी तक जेपीसी में शामिल होने के पक्ष में थी, लेकिन अब उसके रुख में भी संशय पैदा हो गया है।



