पटना: बिहार की राजधानी पटना हमेशा से सियासी हलचल का केंद्र रही है। यह एक बार फिर चर्चा में है। इस बार सवाल यह है कि क्या एनडीए का अजेय गढ़ माने जाने वाले इस शहर में महागठबंधन अपनी ताकत दिखा पाएगा? दोनों पक्षों के बीच कांटे की टक्कर और रणनीतिक चालों के बीच, पटना की सियासत में कौन भारी पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा। आइए, इस सियासी जंग के मायने और संभावनाओं को तलाशते हैं।
गंगा नदी के दक्षिणी तट पर बसा है पटना को भारत का सबसे पुराना बसे हुए शहरों में से एक माना जाता है। जिसका इतिहास करीब 2500 साल से भी पुराना है। प्राचीन पटना कि बात करें तो यह शहर शिक्षा, संस्कृति और व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। पटना कभी मौर्य साम्राज्य हुआ करता था। वही वर्तमान समय में बिहार के सबसे ज्यादा विधानसभा सीटों वाला जिला है।
पिछले 2020 विधानसभा चुनाव में पाटलिपुत्र लोकसभा के आतंर्गत आने वाले विधानसभा सीटों पर जिस तरीके से घमासान हुआ था। इस बार विधानसभा चुनाव भी ऐसा प्रतीत हो रहा है कि साख और पगड़ी की लड़ाई में फिर पाटलिपुत्र बिहार की राजनीति का कहीं केंद्र न बन जाए।
पटना शहर बीजेपी का अभेद किला कहा जाता है जिसको ढ़हाने की कई राजनीतिक धुरधंरो ने कोशिश कि पर सफलता नहीं मिली। यहां के सभी विधानसभा और दो में से एक लोकसभा पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। यहां तक कि पटना मेयर भी बीजेपी समर्थित है। अब बदले राजनीतिक परिदृश्य में इस गढ़ को बचाना बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती है। 2024 लोकसभा चुनाव में पटना के अंतर्गत आने वाले दो लोकसभा सीटों में से एक भाजपा हार गयी थी। यह सीट राजद के खेमे में चली गई थी। लेकिन अच्छी बात यह है कि इसबार उनके साथ 2020 कि तरह ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार NDA के हिस्सा है और मुख्यमंत्री का चेहरा भी।
पटना शहरी कीसभी विधानसभा सीटों पर बीजेपी का कब्जा
पटना शहरी क्षेत्र में आने वाले चारों विधानसभा कुम्हरार, दीघा, बांकीपुर और पटना साहिब में बीजेपी के विधायक है। यहां बांकीपुर से विधायक नितिन नवीन कुम्हरार विधायक अरुण सिन्हा, दीघा विधानसभा से संजीव चौरसिया ने जीत दर्ज की है. जबकि पटना साहिब से नदंकिशोर यादव विधायक हैं। BJP के नंद किशोर यादव ने कांग्रेस के प्रवीण कुशवाहा को 18,662 वोटों से हराया था, जबकि बांकिपुर विधानसभा सभा सीट से बीजेपी के नितिन नवीन ने शत्रुध्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा को 40 हजार से ज्यादा वोटों से पटखनी दी थी। कुम्हरार से अरुण सिन्हा ने आरजेडी उम्मीदवार को 24463 मतों से शिकस्त दी थी।जबकि यादव बहुल दीघा से बीजेपी के संजीब चौरसिया ने 46073 वोट से चुनाव जीता था।
पटना ग्रामीण में महागठबंधन का दबदबा
पटना ग्रामीण के अंतर्गत आने वाली 6 विधानसभा सीटों कि पर महागठबंधन का कब्जा है। यहां दानापुर विधानसभा से राजद से विधायक रितलाल यादव है। मनेर विधानसभा से राजद के विधायक भाई वीरेंद्र है, फुलावारी शरीफ विधानसभा से माले के विधायक गोपाल रविदास हैं। मसौढ़ी विधानसभा से राजद कि विधायिका रेखा पासवान है, पालीगंज विधानसभा से भाकपा (माले) एल के विधायक संदीप सौरभ है। वहीं, विक्रम विधानसभा कि बात करें तो यहां के वर्तमान विधायक सिद्धार्थ सौरभ है।
2025 में किसका पड़ला भारी
2025 विधानसभा चुनाव में पटना शहरी क्षेत्रों में NDA के किला भेदना महागठबंधन के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि पटना शहरी पर NDA के सहयोगी बीजेपी का एकतरफा कब्जा और यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( RSS ) का भी काफी प्रभाव चुनाव में देखने को मिलता है। इस बार बिहार विधानसभा के चुनावी अखाड़े में राजनीतिक रणनीतिकार कहे जाने वाले प्रशांत किशोर कि पार्टी जनसुराज भी मैदान में हैं। पार्टी कि नजर भी पटना के शहरी विधानसभा सीटों पर है इसलिए NDA को यह किला आसानी से हासिल होने वाला नहीं है। वही बात ग्रामीण विधानसभा सीटों कि करें तो पिछले 2020 चुनाव से 2025 विधानसभा चुनाव तक महागठबंधन के लिए मुश्किल हो सकती है। कई सीटों पर NDA मजबूत और सक्रिय और अनुभवी नेता को टिकट दे सकती है। ताकि महागठबंधन के गढ़ में सेंधमारी हो सके। हालांकि जब तक मतदाताओं के मूड में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता तब तक कुछ कहना गलत होगा। पटना शहरी और ग्रामीण पर किस पार्टी का होगा कब्जा यह आने वाला समय भी बताएगा।



