नई दिल्ली: स्वेटर निकालने का मौसम आया, मगर गर्मी ने कहा, मैं अभी नहीं जाने वाली! कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की ताजा रिपोर्ट ने सबको चौंकाया। अक्टूबर 2025 में धरती का औसत तापमान 15.14 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा। यह 1991-2020 के औसत से 0.70 डिग्री और औद्योगिक काल से पहले के समय से पूरे 1.55 डिग्री ज़्यादा है। मतलब, वो 1.5 डिग्री की ‘लक्ष्मण रेखा’ अब हमारे पैरों तले दब चुकी है!
2025 बना ‘गर्मी का सुपरस्टार’
सिर्फ अक्टूबर ही नहीं, पूरा साल आग उगल रहा है। अगस्त और सितंबर भी तीसरे सबसे गर्म महीने बने। नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 तक का औसत तापमान औद्योगिक काल से 1.5 डिग्री ऊपर चला गया। विशेषज्ञ चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे हैं कि 2025 दुनिया के तीन सबसे गर्म सालों में जरूर जगह बनाएगा। सी3एस की उप निदेशक सामंथा बर्गेस ने कहा कि हम उस दशक में कदम रख चुके हैं, जहां 1.5 डिग्री पीछे छूटने वाली है। धरती तेजी से बदल रही है, ये किसी फिल्म का ट्रेलर नहीं, हकीकत है!
आर्कटिक भी पसीना-पसीना
फिनलैंड, स्पेन, पुर्तगाल में लोग पंखे तलाशते रहे। कनाडा और आर्कटिक महासागर ने रिकॉर्ड तोड़ गर्मी झेली। समुद्र भी अब ठंडे नहीं रहे। अक्टूबर में समुद्री सतह का तापमान 20.54 डिग्री तक चढ़ गया, जो तीसरा सबसे ऊंचा रिकॉर्ड है। उत्तरी प्रशांत महासागर तो जैसे उबल पड़ा!
बर्फ की चादरें पिघलकर आंसू बन गईं
आर्कटिक में बर्फ 12% कम हो गई, यह आठवां सबसे कम रिकॉर्ड दर्ज है। अंटार्कटिका में 6% बर्फ गायब, जो तीसरा सबसे कम स्तर है। बेलिंग्सहाउजेन सागर और हिंद महासागर के आसपास बर्फ पिघलकर समुद्र में मिल गई। ध्रुव भी अब गर्मी से थर-थर कांप रहे हैं!
कहीं बाढ़, कहीं सूखे की आग
बाल्कन, नॉर्वे, उत्तरी भारत, नेपाल में बादल फट पड़े। वहीं स्पेन, उत्तरी अफ्रीका, रूस और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया पानी को तरस गए। प्रकृति का मूड स्विंग पूरे जोर पर है!
COP-30: आखिरी मौका या फिर वादों की बारिश?
ब्राजील में 11 नवंबर से शुरू हो रहा COP-30 सम्मेलन अब उम्मीद की आखिरी किरण है। दुनिया की निगाहें वहां टिकी हैं। क्या नेता सिर्फ भाषण देकर लौटेंगे या ठोस कदम उठाएंगे? अगर अभी नहीं जागे तो आने वाला दशक सिर्फ आंकड़ों में नहीं, हमारे घरों में गर्मी की लपटें लेकर आएगा। फसलें जलेंगी, शहर डूबेंगे, लाखों लोग बेघर हो जाएंगे।



