उडुपी। कर्नाटक की पावन भूमि उडुपी में हाल ही में एक ऐसा दृश्य साकार हुआ, जिसने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अखंडता को और भी गहरा कर दिया। प्रयागराज महाकुंभ 2025 के दौरान इस्कॉन के संस्थापक श्रील ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद को प्रदान किए गए ‘विश्वगुरु’ सम्मान को उडुपी के भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में श्रद्धापूर्वक समर्पित किया गया। यह ऐतिहासिक क्षण उत्तर की अखाड़ा संस्कृति और दक्षिण की आचार्य परंपरा के अद्भुत मिलन का साक्षी बना

प्रयागराज से उडुपी तक का सेतु
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने महाकुंभ के दौरान सनातन धर्म में अतुलनीय योगदान के लिए श्रील प्रभुपाद को ‘विश्वगुरु’ की उपाधि से नवाजा था। इसी सम्मान को उडुपी श्रीकृष्ण मठ में चल रहे ‘विश्व गीता पर्याय’ के अंतर्गत ‘श्रीकृष्ण समर्पणोत्सव’ में समर्पित किया गया। पुत्तिगे मठ के पीठाधीश श्री श्री सुगुणेन्द्र तीर्थ स्वामीजी की उपस्थिति और हरिद्वार के निरंजनी अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर कैलाशानंद गिरी महाराज के आगमन ने इस आयोजन को उत्तर और दक्षिण भारत का साझा उत्सव बना दिया।
भक्ति और साहित्य का अनूठा मेल
कार्यक्रम की अध्यक्षता इस्कॉन बेंगलुरु के अध्यक्ष श्री मधु पंडित दास ने की। इस अवसर पर कन्नड़ भाषा में रचित एक विशेष महाकाव्य ‘श्रील प्रभुपाद चरितामृतम्’ का विमोचन भी हुआ। डॉ. कब्बिनाले वसंत भारद्वाज द्वारा अष्टादश पदी छंद में रचित यह ग्रंथ प्राचीन और आधुनिक कन्नड़ साहित्य का सुंदर संगम है। कार्यक्रम के दौरान भगवान श्रीकृष्ण को रत्नजड़ित मुकुट और अलंकरण अर्पित किए गए, जिसमें उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय कला का समन्वय दिखाई दिया।

“हर घर गीता, हर हृदय गीता” का संकल्प
स्वामी सुगुणेन्द्र तीर्थ जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि भक्तों की महिमा से ही भगवान प्रसन्न होते हैं। यह आयोजन ‘विश्व गीता पर्याय’ के उस महान संकल्प को भी मजबूती देता है, जिसका ध्येय हर घर तक भगवद्गीता पहुँचाना है। इस अवसर पर इस्कॉन बेंगलुरु द्वारा एक लाख भगवद्गीता वितरण का अभियान भी चलाया गया।
करीब 800 वर्ष पूर्व श्री माध्वाचार्य द्वारा स्थापित उडुपी मठ में संपन्न हुआ यह समारोह संदेश देता है कि प्रयागराज से लेकर उडुपी तक भारत की आध्यात्मिक चेतना एक ही है। यह आयोजन राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समन्वय का एक नया प्रेरक अध्याय बनकर उभरा है।



