नई दिल्ली:
भारतीय शिक्षा व्यवस्था और स्कूली पाठ्यक्रमों में एक ऐतिहासिक और युगांतरकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के सिद्धांतों पर चलते हुए नौवीं कक्षा के सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रम को पूरी तरह से नया रूप दे दिया है।
इस बड़े बदलाव का सबसे प्रमुख और ध्यान खींचने वाला हिस्सा है—भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादित और काला अध्याय यानी ‘आपातकाल’ (Emergency)। अब तक जिस विषय को छात्र 11वीं और 12वीं कक्षा में मैच्योर होने पर राजनीति विज्ञान के तहत पढ़ते थे, उसे अब नौवीं कक्षा के बच्चों की नई पाठ्यपुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियांड’ (Understanding Society: India and Beyond) में शामिल कर लिया गया है। इस पुस्तक के पेज नंबर-155 पर लोकतंत्र के सामने चुनौतियों से जुड़े अध्याय में इसे प्रमुखता से जगह दी गई है।
आपातकाल की पूरी कहानी: इतिहास के झरोखे से
देश में 25 जून, 1975 की वो रात कोई नहीं भूल सकता, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आंतरिक अशांति के आधार पर अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर दी थी। आज जब देश इस घटना की बरसी मना रहा है, तो स्कूली बच्चों के लिए इसे जानना और भी प्रासंगिक हो जाता है।
यह आपातकाल पूरे 21 महीने (21 March 1977 तक) लागू रहा। इस दौरान जो कुछ हुआ, उसने भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर रख दिया था:
- मौलिक अधिकारों का हनन: नागरिकों के बुनियादी अधिकार, जैसे जीने का अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 21 and 19), पूरी तरह से सस्पेंड कर दिए गए थे। बिना किसी वारंट के किसी को भी जेल में डाला जा सकता था।
- मीडिया पर सेंसरशिप: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की जुबान पर ताला लगा दिया गया था। अखबारों में क्या छपेगा, यह सरकार तय करती थी। यही वजह है कि नई किताब में छात्रों को मीडिया की वास्तविक और स्वतंत्र भूमिका के बारे में विशेष रूप से पढ़ाया जा रहा है।
- जयप्रकाश नारायण (JP) का आंदोलन: इस तानाशाही के खिलाफ देश में जो जन-आक्रोश पनपा, उसका नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने किया। ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ के नारे के साथ शुरू हुए इस आंदोलन ने पूरे देश के युवाओं और विपक्ष को एक मंच पर ला खड़ा किया, जिसका जिक्र एनसीईआरटी ने इस नए पाठ में प्रमुखता से किया है।
पाठ्यक्रम का वैचारिक बदलाव: यूरोप-केंद्रित इतिहास से भारतीयता की ओर
यह बदलाव केवल आपातकाल को शामिल करने तक सीमित नहीं है। एनसीईआरटी ने अपनी इस नई पाठ्यपुस्तक में पूरे नजरिए को ही बदल दिया है। अब तक भारतीय छात्र अपने इतिहास की किताबों में खुद से ज्यादा यूरोप के इतिहास को रटते थे। नई नीति के तहत इस ‘यूरोप-केंद्रित विषयवस्तु’ को बहुत सीमित कर दिया गया है।
क्या हटाया गया?
सालों से नौवीं कक्षा के इतिहास में पढ़ाई जाने वाली कुछ सबसे प्रमुख वैश्विक घटनाएं अब इस पुस्तक से विदा ले चुकी हैं:
- फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution)
- यूरोप में समाजवाद और रूसी क्रांति (Russian Revolution)
- नाजीवाद और हिटलर का उदय (Rise of Hitler)
- उपनिवेशवाद (Colonialism) से जुड़े अध्याय।
क्या जोड़ा गया?
इन विदेशी अध्यायों की जगह अब छात्र प्राचीन और महान सभ्यताओं के कालक्रम और उनके भौगोलिक विस्तार को समझेंगे:
- प्राचीन सभ्यताएं: हड़प्पा, मेसोपोटामिया, मिस्र (Egypt) और चीन की सभ्यताओं का गहन अध्ययन।
- सुमेरियन सभ्यता का व्यावहारिक ज्ञान: छात्र केवल राजा-रानियों की कहानियां नहीं बल्कि सुमेरियन सभ्यता की उन्नत सिंचाई व्यवस्था, उनके निर्माण कार्य और सामाजिक संगठन के ढांचे को समझेंगे।
भारतीय ज्ञान परंपरा और व्यावहारिक दृष्टिकोण
यह नई पुस्तक छात्रों को केवल रट्टू तोता नहीं बनाएगी, बल्कि उन्हें समाज, इतिहास, भूगोल और लोकतंत्र का व्यावहारिक दृष्टिकोण देगी। इसमें दैनिक जीवन के उदाहरणों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को पिरोया गया है:
- पंचमहाभूत की अवधारणा: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के माध्यम से बच्चों को समझाया गया है कि प्रकृति और मानव जीवन एक-दूसरे से कितने गहरे जुड़े हुए हैं।
- आपादा प्रबंधन (Landslide): किताब में ‘लैंडस्लाइड’ नाम से एक विशेष व्यावहारिक पाठ है, जहां छात्र पत्थर, मिट्टी और मलबे के खिसकने के वैज्ञानिक कारणों को जानेंगे और अपने आसपास ऐसी आपात स्थिति से बचने के व्यावहारिक उपाय सीखेंगे।
तुलनात्मक विश्लेषण: इतिहास का आपातकाल बनाम वर्तमान के बदलते ट्रेंड्स
जब हम 1975 के आपातकाल की तुलना आज के राजनीतिक और सामाजिक ट्रेंड्स से करते हैं, तो एनसीईआरटी के इस कदम की अहमियत और बढ़ जाती है।
| आयाम (Dimensions) | 1975 का आपातकाल (The Historical Emergency) | वर्तमान के ट्रेंड्स और चुनौतियाँ (Current Trends) |
| सूचना का नियंत्रण | सरकार ने अखबारों की बिजली काट दी थी, संपादकीय सेंसर होते थे और रेडियो पर सिर्फ सरकारी गान होता था। | आज के डिजिटल युग में ‘सेंसरशिप’ का रूप बदल गया है। अब चुनौती फेक न्यूज (Fake News), ‘डीपफेक’ और एल्गोरिदम के जरिए नैरेटिव कंट्रोल करने की है। |
| नागरिक अधिकार | अदालतों के दरवाजे बंद थे, मीसा (MISA) के तहत बिना ट्रायल नेताओं को जेल में ठूंस दिया जाता था। | आज न्यायपालिका और नागरिक समाज सजग हैं, लेकिन डेटा प्राइवेसी, सर्विलांस (Surveillance) और डिजिटल राइट्स नागरिक स्वतंत्रता के नए मोर्चे बन चुके हैं। |
| लोकतंत्र का चौथा स्तंभ | मीडिया को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में झुका दिया गया था (लालकृष्ण आडवाणी का मशहूर कथन: “जब आपको रेंगने को कहा गया, तो आप लेट गए”)। | आज मुख्यधारा के मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता एक समानांतर शक्ति बन चुके हैं, जिससे सूचना को पूरी तरह दबाना नामुमकिन हो गया है। |
| जन आंदोलन | जेपी आंदोलन पूरी तरह जमीन पर, रैलियों और पर्चों के सहारे लड़ा गया था। | आज के आंदोलन ‘हैशटैग’ (#) और सोशल मीडिया कैंपेन से शुरू होकर जमीन पर उतरते हैं। युवाओं की लामबंदी अब डिजिटल स्पेस में बहुत तेजी से होती है। |
निष्कर्ष
एनसीईआरटी का यह नया बदलाव बच्चों को सिर्फ अतीत की तारीखें याद रखना नहीं सिखाता, बल्कि उन्हें यह समझाता है कि लोकतंत्र कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे एक बार पा लिया तो वो हमेशा सुरक्षित रहेगी। नौवीं कक्षा के संवेदनशील पड़ाव पर ही जब बच्चे ‘आपातकाल’ जैसी ऐतिहासिक भूलों और मीडिया की वास्तविक भूमिका को पढ़ेंगे, तो वे भविष्य में एक सजग, जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनेंगे जो देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा करना जानते हैं।



