फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) और आत्मनिर्भर ऊर्जा भविष्य की ओर एक विशाल कदम

भाविनी (BHAVINI) का उद्योग साझेदारी कॉन्क्लेव और 2031-32 तक 22,380 मेगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य

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कलपक्कम/चेन्नई: किसी भी राष्ट्र की प्रगति और आर्थिक विकास की धुरी उसकी ऊर्जा सुरक्षा पर निर्भर करती है। 21वीं सदी में, जब जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक संकट बन चुका है और कार्बन उत्सर्जन को कम करने का भारी दबाव है, तब स्वच्छ, विश्वसनीय और बेसलोड (निरंतर) ऊर्जा के रूप में परमाणु ऊर्जा का महत्व अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया है। भारत, दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के नाते, अपनी विशाल ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए केवल जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल) पर निर्भर नहीं रह सकता। इसी चुनौती को अवसर में बदलते हुए, भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम एक ऐसे मुकाम पर पहुँच गया है, जो दुनिया भर के वैज्ञानिक समुदाय के लिए एक मिसाल है।

हाल ही में, भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के तत्वावधान में कार्यरत सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम, भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) ने फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) के विस्तार के लिए एक भव्य ‘इंडस्ट्री पार्टनरशिप कॉन्क्लेव’ (उद्योग साझेदारी सम्मेलन) का आयोजन किया। यह आयोजन केवल एक बैठक नहीं थी, बल्कि यह भारत के ऊर्जा भविष्य को स्वदेशी तकनीकी और औद्योगिक शक्ति के दम पर सुरक्षित करने का एक शंखनाद था।

इस विस्तृत ब्लॉग में, हम अप्रैल 2026 की ऐतिहासिक वैज्ञानिक उपलब्धि, भाविनी के इस सम्मेलन के मुख्य अंश, भारत के बहुचर्चित तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम और देश के ऊर्जा विस्तार के लक्ष्यों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।

अप्रैल 2026 की ऐतिहासिक उपलब्धि: PFBR की ‘प्रथम क्रिटिकैलिटी’

इस उद्योग साझेदारी कॉन्क्लेव की पृष्ठभूमि में एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक वैज्ञानिक सफलता छिपी है। कुछ ही महीने पहले, अप्रैल 2026 में, तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित भारत के 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने सफलतापूर्वक अपनी ‘प्रथम क्रिटिकैलिटी’ (First Criticality) प्राप्त कर ली थी।

क्रिटिकैलिटी का अर्थ क्या है?

परमाणु विज्ञान की भाषा में, ‘प्रथम क्रिटिकैलिटी’ का अर्थ है रिएक्टर के कोर (क्रोड) के भीतर एक नियंत्रित परमाणु विखंडन श्रृंखला प्रतिक्रिया (Controlled Fission Chain Reaction) की सुरक्षित और स्थायी शुरुआत होना।

  • जब कोई रिएक्टर क्रिटिकल होता है, तो इसका मतलब है कि प्रत्येक परमाणु विखंडन से उत्पन्न न्यूट्रॉन, औसतन एक और विखंडन पैदा कर रहा है, जिससे ऊर्जा का निरंतर और स्थिर उत्पादन सुनिश्चित होता है।
  • यह किसी भी नए परमाणु रिएक्टर के जीवनकाल का सबसे महत्वपूर्ण और पहला बड़ा कदम होता है।

यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। इसके पीछे भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों के दशकों का अथक परिश्रम और शोध शामिल है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत अब जटिल फास्ट ब्रीडर तकनीक को न केवल समझता है, बल्कि उसे सफलतापूर्वक संचालित करने में भी पूरी तरह सक्षम है।

उद्योग साझेदारी कॉन्क्लेव: एक नए इकोसिस्टम का निर्माण

कलपक्कम की इस शानदार सफलता के बाद, भाविनी (BHAVINI) के इस कॉन्क्लेव ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उद्योगों, प्रौद्योगिकी भागीदारों, भारी उपकरण निर्माताओं और देश के शीर्ष इंजीनियरिंग संगठनों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों को एक मंच पर ला खड़ा किया। इस महासम्मेलन का मुख्य उद्देश्य बहुत स्पष्ट था: भविष्य के फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों (FBRs) के निर्माण के लिए एक सहयोगात्मक और आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का निर्माण करना।

भाविनी के CMD का संबोधन और विजन

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भाविनी के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक (CMD), श्री पी.ए. सुरेश बाबू ने प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) को वास्तविकता में बदलने के लिए औद्योगिक भागीदारों के अमूल्य योगदान के लिए गहरी कृतज्ञता व्यक्त की।

अपने संबोधन में उन्होंने कुछ बेहद महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला:

  • पूर्व अनुभवों से सीख: उन्होंने भारत के सफल प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) बेड़े और तमिलनाडु के कुडनकुलम में चालू विदेशी VVER (सोवियत-मूल के वाटर-वाटर एनर्जेटिक रिएक्टर) कार्यक्रम के साथ अपने व्यापक अनुभव को साझा किया।
  • उद्योगों का परिवर्तनकारी प्रभाव: उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कैसे भारतीय उद्योगों ने अपनी विनिर्माण और इंजीनियरिंग क्षमता से देश के परमाणु क्षेत्र को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।
  • साझेदारी-संचालित दृष्टिकोण: CMD ने स्पष्ट किया कि जैसे-जैसे भारत अपने FBR कार्यक्रम का विस्तार करने की योजना बना रहा है, वैसे-वैसे एक “साझेदारी-संचालित दृष्टिकोण” (Partnership-driven approach) समय की मांग है। केवल सरकार या DAE अकेले इस विशाल कार्य को पूरा नहीं कर सकते।

कॉन्क्लेव में उभरे नए अवसर

सम्मेलन में उपस्थित डोमेन विशेषज्ञों ने फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों के नियोजित विकास से उत्पन्न होने वाले नए अवसरों पर गहन विचार-मंथन किया। मुख्य फोकस निम्नलिखित क्षेत्रों पर रहा:

  1. स्वदेशी विनिर्माण और ‘मेक इन इंडिया’: महत्वपूर्ण प्रणालियों, टर्बाइन, वाल्व और रिएक्टर उपकरणों का स्थानीय स्तर पर निर्माण करना। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी आयात पर निर्भरता को खत्म करना और भारत में रोजगार के नए अवसर पैदा करना है।
  2. गुणवत्ता आश्वासन (Quality Assurance): परमाणु क्षेत्र में सुरक्षा सर्वोपरि है। इसलिए, विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाने के साथ-साथ अत्यंत सख्त गुणवत्ता नियंत्रण मानकों को लागू करने पर जोर दिया गया।
  3. स्थायी पारिस्थितिकी तंत्र: सार्वजनिक (PSUs) और निजी क्षेत्र की कंपनियों के बीच एक ऐसा मजबूत नेटवर्क बनाना, जो भविष्य में एक साथ कई रिएक्टरों के निर्माण के दबाव को आसानी से संभाल सके।

भारत का अद्वितीय त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम (The 3-Stage Nuclear Programme)

इस पूरे कॉन्क्लेव और PFBR की सफलता के वास्तविक महत्व को समझने के लिए, हमें भारत के उस दूरदर्शी मास्टरप्लान को समझना होगा जिसे 1950 के दशक में महान भौतिक विज्ञानी डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने तैयार किया था।

भारत की भौगोलिक और प्राकृतिक संसाधन स्थिति दुनिया के अन्य देशों से अलग है। हमारे पास प्राकृतिक यूरेनियम (Uranium) का भंडार बहुत सीमित है (वैश्विक भंडार का मात्र 1-2%), लेकिन थोरियम (Thorium) के मामले में भारत दुनिया के सबसे धनी देशों में से एक है (भारत के समुद्र तटों की मोनोजाइट रेत में दुनिया का लगभग 25% थोरियम मौजूद है)।

भारत का 3-चरणीय परमाणु कार्यक्रम इसी प्राकृतिक संतुलन पर आधारित एक क्रमिक रणनीति है, जिसका अंतिम लक्ष्य यूरेनियम को प्लूटोनियम में बदलना और अंततः असीमित और टिकाऊ ऊर्जा के लिए थोरियम का उपयोग करना है।

पहला चरण: प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWRs)

  • तकनीक: पहले चरण में, प्राकृतिक यूरेनियम (Natural Uranium) का उपयोग ईंधन के रूप में और भारी जल (Heavy Water – D2O) का उपयोग मॉडरेटर और कूलेंट के रूप में किया जाता है।
  • उपोत्पाद (By-product): बिजली पैदा करने के अलावा, यह प्रक्रिया एक अत्यंत महत्वपूर्ण बाय-प्रोडक्ट उत्पन्न करती है जिसे प्लूटोनियम-239 (Pu-239) कहा जाता है।
  • वर्तमान स्थिति: भारत इस तकनीक में पूरी तरह से आत्मनिर्भर और विश्वगुरु है। वर्तमान में भारत के पास लगभग 24 PHWR परमाणु ऊर्जा संयंत्र सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं, जो देश के कुल बिजली उत्पादन में लगभग 3 प्रतिशत का योगदान देते हैं।

दूसरा चरण: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBRs) – (वर्तमान फोकस)

  • तकनीक: यह चरण भारत के भविष्य का प्रवेश द्वार है। इसमें फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों का उपयोग किया जाता है। ये रिएक्टर पहले चरण से प्राप्त बाय-प्रोडक्ट (प्लूटोनियम-239) और प्राकृतिक यूरेनियम के मिश्रण (MOX फ्यूल) का उपयोग करते हैं।
  • ब्रीडिंग का जादू: इन्हें ‘ब्रीडर’ (Breeder) इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये रिएक्टर बिजली पैदा करने के साथ-साथ, जितना परमाणु ईंधन खपत करते हैं, उससे अधिक नया ईंधन (विखंडनीय सामग्री) पैदा करते हैं।
  • थोरियम का रूपांतरण: इस चरण में रिएक्टर के कोर के चारों ओर थोरियम-232 का एक आवरण (Blanket) रखा जाता है। परमाणु प्रतिक्रिया के दौरान निकलने वाले तेज न्यूट्रॉन इस थोरियम से टकराते हैं और इसे यूरेनियम-233 (U-233) में बदल देते हैं।
  • अप्रैल 2026 में कलपक्कम PFBR की क्रिटिकैलिटी इसी दूसरे चरण की वास्तविक और वाणिज्यिक शुरुआत का प्रतीक है।

तीसरा चरण: थोरियम आधारित उन्नत रिएक्टर (Advanced Heavy Water Reactors – AHWRs)

  • तकनीक: यह भारत के परमाणु कार्यक्रम का अंतिम और सबसे महत्वाकांक्षी चरण है। इसमें दूसरे चरण से प्राप्त यूरेनियम-233 को थोरियम के साथ मिलाकर उन्नत रिएक्टरों में ईंधन के रूप में उपयोग किया जाएगा।
  • भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा: चूंकि भारत के पास थोरियम का विशाल भंडार है, एक बार जब यह तकनीक व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य हो जाएगी, तो भारत ऊर्जा के मामले में सैकड़ों वर्षों तक पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो जाएगा। यह चरण अभी उन्नत अनुसंधान और विकास (R&D) के चरण में है।

फास्ट ब्रीडर तकनीक की महत्ता: सरल शब्दों में, भारत की FBR तकनीक वर्तमान में चल रहे प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टरों (PHWRs) के बेड़े और भविष्य में तैनात होने वाले थोरियम-आधारित रिएक्टरों के बीच एक “महत्वपूर्ण पुल” (Vital Bridge) है। बिना FBR के, थोरियम को यूरेनियम-233 में बदलना और तीसरे चरण तक पहुंचना असंभव है।

भारत का लक्ष्य: परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता में महाविस्तार

भारत सरकार ने देश के कार्बन फुटप्रिंट (Carbon Footprint) को कम करने और 2070 तक ‘नेट ज़ीरो’ (Net Zero) उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमाणु ऊर्जा को एक प्रमुख हथियार माना है। इसी के तहत ऊर्जा उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ाने का रोडमैप तैयार किया गया है।

वर्तमान स्थिति: आज की तारीख में, भारत के पास देश भर में फैले दो दर्जन से अधिक परमाणु संयंत्रों से लगभग 8,780 मेगावाट (MW) स्वच्छ ऊर्जा उत्पन्न करने की स्थापित क्षमता है।

भविष्य का महत्वाकांक्षी लक्ष्य (2031-32): सरकारी आंकड़ों और वर्तमान में निर्माणाधीन परियोजनाओं के अनुसार, भारत की परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता 2031-32 तक 22,380 मेगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है।

इस भारी उछाल को प्राप्त करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं:

  • फ्लीट मोड (Fleet Mode): सरकार ने ‘फ्लीट मोड’ में 700 मेगावाट क्षमता वाले 10 स्वदेशी PHWRs के निर्माण को मंजूरी दी है, जिससे निर्माण का समय और लागत कम होगी।
  • FBR का विस्तार: कलपक्कम PFBR की सफलता के बाद, भाविनी की योजना भविष्य में और अधिक वाणिज्यिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (Commercial Fast Breeder Reactors – CFBRs) स्थापित करने की है, जिसके लिए ही यह उद्योग साझेदारी कॉन्क्लेव आयोजित किया गया था।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: परमाणु ऊर्जा अधिनियम में संशोधन के माध्यम से और पीपीपी (PPP) मॉडल को बढ़ावा देकर, गैर-परमाणु उपकरणों और टर्बाइन आइलैंड्स के निर्माण में निजी कंपनियों की भारी पूंजी और विशेषज्ञता का उपयोग किया जा रहा है।

निष्कर्ष: आत्मनिर्भर ऊर्जा का उदय

भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) द्वारा आयोजित यह उद्योग साझेदारी कॉन्क्लेव कोई सामान्य व्यापारिक सम्मेलन नहीं था। यह एक राष्ट्र के अपने बलबूते पर खड़े होने, विदेशी तकनीक पर निर्भरता को उखाड़ फेंकने और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, सुरक्षित और स्थायी ऊर्जा भविष्य सुनिश्चित करने का संकल्प था।

अप्रैल 2026 में 500 मेगावाट के PFBR का क्रिटिकल होना भारत के वैज्ञानिकों की मेधा का जश्न है। लेकिन इसे एक वाणिज्यिक सफलता बनाने और देश के कोने-कोने तक निर्बाध बिजली पहुंचाने की जिम्मेदारी अब भारत के मजबूत उद्योग जगत के कंधों पर है।

भारत का त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम, जो कभी डॉ. भाभा का एक स्वप्न था, अब धीरे-धीरे हकीकत का रूप ले रहा है। जिस दिन हम थोरियम से बिजली बनाने के तीसरे चरण में पूरी तरह से प्रवेश कर जाएंगे, उस दिन भारत ऊर्जा आयात करने वाला देश नहीं, बल्कि ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करने वाला ‘विश्वगुरु’ बन जाएगा। 2031-32 तक 22,380 मेगावाट के लक्ष्य तक पहुंचने की यह यात्रा चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन उद्योगों और सरकार की अटूट साझेदारी से यह मंजिल अब ज्यादा दूर नहीं है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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