नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को लेकर बढ़ती चिंता अब वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख मुद्दा बन चुका है, और एक नए अध्ययन के अनुसार, महिलाएं, युवा, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील लोग, और वामपंथी विचारधारा वाले लोग इस मुद्दे को लेकर सबसे अधिक चिंतित हैं। जर्मनी की लीपजिग यूनिवर्सिटी और टीयू डॉर्टमुंड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस व्यापक शोध में यह भी पाया गया कि जो लोग जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से सीधे प्रभावित होते हैं या इससे संबंधित खबरों के संपर्क में रहते हैं, उनमें यह चिंता अधिक देखी गई। यह अध्ययन ग्लोबल एनवायर्नमेंटल चेंज जर्नल में प्रकाशित हुआ है और जलवायु चिंता पर पहला विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
जलवायु चिंता: डर और प्रेरणा का संगम
अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन को गंभीर खतरे के रूप में देखने वाले और इसके वैज्ञानिक कारणों को समझने वाले लोग अधिक चिंतित रहते हैं। शोधकर्ता डॉ. क्लारा क्यूनर के अनुसार, “यह चिंता मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है, लेकिन यह लोगों को पर्यावरण के अनुकूल व्यवहार और जलवायु नीतियों के समर्थन के लिए भी प्रेरित करती है।” यह चिंता एक ओर तनाव और भय पैदा करती है, तो दूसरी ओर सकारात्मक बदलाव के लिए प्रेरणा भी देती है। यही वजह है कि जलवायु चिंता अब वैज्ञानिकों और समाज के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन गई है।
27 देशों के 1.7 लाख लोग शामिल
इस मेटा-विश्लेषण में 27 देशों के 1,70,747 लोगों के डेटा का विश्लेषण किया गया, जो 94 प्रमुख अध्ययनों से प्राप्त किए गए। शोध से पता चला कि जलवायु चिंता सामान्य चिंता से अलग एक विशेष मानसिक स्थिति है। अध्ययन में जलवायु चिंता और 33 अन्य कारकों के बीच संबंधों का विश्लेषण किया गया, जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि जलवायु चिंता के स्तर और प्रभाव अलग-अलग मापने के तरीकों और अध्ययन की गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं।
नेताओं और नीति निर्माताओं की भूमिका
शोधकर्ता हेंस जैचर ने कहा, “जलवायु चिंता को हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है। यह न केवल एक चेतावनी है, बल्कि सकारात्मक बदलाव का अवसर भी प्रदान करती है।” उन्होंने नेताओं, पत्रकारों और उद्योगपतियों से आग्रह किया कि वे इस चिंता को गंभीरता से लें और इसे जलवायु समाधानों की दिशा में प्रेरणा के रूप में उपयोग करें। विशेष रूप से युवाओं और जलवायु प्रभावों से बार-बार जूझने वाले लोगों के लिए मानसिक सहायता की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
ग्लोबल साउथ में शोध की कमी
अध्ययन में यह भी सामने आया कि अधिकांश शोध विकसित देशों पर केंद्रित हैं, जबकि ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) जलवायु परिवर्तन से अधिक प्रभावित होने की आशंका में हैं। शोधकर्ताओं ने विकासशील देशों में जलवायु चिंता पर अधिक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया। जलवायु चिंता एक वास्तविक और गंभीर मुद्दा है, जो मानसिक बोझ के साथ-साथ समाज को सकारात्मक दिशा में ले जाने की क्षमता भी रखता है।



