नई दिल्ली: हाल ही में यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन रिप्रोडक्शन एंड एम्ब्रियोलॉजी की 41वीं वार्षिक बैठक में एक चौंकाने वाला शोध सामने आया है। वैज्ञानिकों ने मानव प्रजनन द्रवों, जैसे महिलाओं के कूपिक द्रव (फॉलिक्युलर फ्लुइड) और पुरुषों के वीर्य में माइक्रोप्लास्टिक (Microplastics) की मौजूदगी का पता लगाया है। यह अध्ययन जल्द ही ह्यूमन रिप्रोडक्शन जर्नल में प्रकाशित होगा, जिसका शीर्षक है “छिपा खतरा: मानव प्रजनन द्रवों में माइक्रोप्लास्टिक का पता लगाना और विश्लेषण करना।” इस खोज ने प्रजनन स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता पर इसके संभावित खतरों को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
माइक्रोप्लास्टिक क्या हैं?
माइक्रोप्लास्टिक 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जो कई बार इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें नग्न आंखों से देखना असंभव होता है। ये कण बड़े प्लास्टिक कचरे, जैसे डिस्पोजेबल पानी की बोतलें, खाद्य पैकेजिंग, सिंथेटिक कपड़े, और व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों के रासायनिक टूटने से बनते हैं। ये पर्यावरण में व्यापक रूप से फैल चुके हैं और अब मानव शरीर के विभिन्न हिस्सों में भी पाए जा रहे हैं।
शोध में क्या पाया गया?
शोधकर्ताओं ने 29 महिलाओं के कूपिक द्रव और 22 पुरुषों के वीर्य के नमूनों का विश्लेषण किया। ये दोनों द्रव प्राकृतिक और सहायक गर्भाधान प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परिणाम चौंकाने वाले थे:
महिलाओं के कूपिक द्रव: 69% नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए। सबसे आम पॉलिमर था पॉलीटेट्राफ्लूरोएथिलीन (PTFE), जो 31% नमूनों में मौजूद था। इसके बाद पॉलीप्रोपाइलीन (PP) 28%, पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) 17%, पॉलियामाइड (PA) 14%, पॉलीइथिलीन (PE) 10%, पॉलीयुरेथेन (PU) 10%, और पॉलीस्टाइरीन (PS) 7% नमूनों में पाए गए।
पुरुषों के वीर्य: 55% नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी थी। PTFE फिर से सबसे प्रमुख पॉलिमर था, जो 41% नमूनों में पाया गया, इसके बाद PS (14%), PET (9%), PA (5%), और PU (5%) थे। शोधकर्ताओं ने कहा कि माइक्रोप्लास्टिक की मानव शरीर में मौजूदगी पहले से ही विभिन्न अध्ययनों में सामने आ चुकी है, लेकिन प्रजनन द्रवों में इसकी इतनी व्यापक उपस्थिति चिंताजनक है।
प्रजनन स्वास्थ्य पर प्रभाव
माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए एक उभरता हुआ खतरा है। पशुओं पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि माइक्रोप्लास्टिक ऊतकों में जमा होने पर सूजन, मुक्त कणों का निर्माण, डीएनए क्षति, कोशिका क्षरण, और हार्मोनल असंतुलन जैसे प्रभाव डाल सकते हैं। यह संभव है कि ये कण मानव अंडाणु या शुक्राणु की गुणवत्ता को प्रभावित करें, लेकिन इसकी पुष्टि के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है। वैज्ञानिक अब बड़े पैमाने पर अध्ययन की योजना बना रहे हैं, जिसमें जीवनशैली और पर्यावरणीय कारकों का विस्तृत विश्लेषण शामिल होगा ताकि माइक्रोप्लास्टिक और प्रजनन क्षमता के बीच संबंध को समझा जा सके।
क्या यह चिंता का विषय है?
शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रजनन क्षमता कई कारकों जैसे उम्र, स्वास्थ्य, और आनुवंशिकी से प्रभावित होती है। माइक्रोप्लास्टिक इनमें से एक संभावित कारक हो सकता है, लेकिन अभी इसे लेकर घबराने की जरूरत नहीं है। हालांकि, यह खोज प्लास्टिक के उपयोग को कम करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है। कुछ सरल कदम, जैसे कांच के बर्तनों में भोजन संग्रह करना, प्लास्टिक की बोतलों का उपयोग सीमित करना, और एकल-उपयोग प्लास्टिक से बचना, माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क को कम करने में मदद कर सकते हैं।
बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण
पिछले 75 वर्षों में वैश्विक प्लास्टिक उत्पादन 250 गुना बढ़ चुका है, और अनुमान है कि 2060 तक यह फिर से तिगुना हो सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव एक गंभीर चेतावनी है। संयुक्त राष्ट्र में चल रही वैश्विक प्लास्टिक संधि वार्ता में प्लास्टिक उत्पादन को सीमित करने पर जोर देना जरूरी है ताकि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा की जा सके।
निष्कर्ष
यह शोध माइक्रोप्लास्टिक के मानव प्रजनन द्रवों में प्रवेश को दर्शाता है, जो पर्यावरणीय प्रदूषण और इसके स्वास्थ्य पर प्रभावों की गंभीरता को उजागर करता है। हालांकि इसके प्रजनन क्षमता पर प्रभाव को समझने के लिए और शोध की जरूरत है, लेकिन यह खोज हमें अपने दैनिक जीवन में प्लास्टिक के उपयोग को कम करने और पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाने की प्रेरणा देती है।



