क्या भारत बिना प्रकृति को नुकसान पहुंचाए तरक्की की नई राह चुन सकता है?

कैसे भारत सरकार अपने जंगलों को काटे बिना और जानवरों के रास्तों को रोके बिना देश में सड़कें, मोबाइल टावर और पानी की लाइनें बिछाने की योजना बना रही है। इसमें कोयंबटूर में हुई ९१वीं वन्यजीव बोर्ड की बैठक के फैसलों, लुप्त हो रहे जीवों को बचाने के नए तरीकों और इतिहास से लेकर आज तक के पर्यावरण संतुलन का पूरा विश्लेषण शामिल है।

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कोयंबटूर, तमिलनाडु: जब भी किसी देश में नई सड़कें बनती हैं, रेल की पटरियां बिछाई जाती हैं या बिजली के बड़े-बड़े खंभे खड़े किए जाते हैं, तो आमतौर पर एक सवाल सबके मन में उठता है—क्या इस तरक्की के लिए हमें अपने जंगलों और वहां रहने वाले बेजुबान जानवरों की बलि देनी पड़ेगी? यह एक ऐसा सवाल है जो दशकों से दुनिया भर के नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और आम जनता के बीच बहस का विषय रहा है। एक तरफ हमें अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूल, पीने के साफ पानी के लिए पाइपलाइन और इंटरनेट के लिए मोबाइल टावरों की जरूरत है, तो दूसरी तरफ हमें अपने राष्ट्रीय पशु बाघ, विशालकाय हाथी और आसमान में उड़ते खूबसूरत पक्षियों के घरों को भी बचाना है।

इसी बेहद संवेदनशील और जरूरी मुद्दे पर रास्ता निकालने के लिए, भारत के कोयंबटूर शहर में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति की ९१वीं बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने की। इस बैठक में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए १३१ ऐसे विकास प्रोजेक्ट्स पर विचार किया गया, जो किसी न किसी रूप में जंगलों या वन्यजीव क्षेत्रों के पास से गुजरते हैं। इस बैठक का मुख्य संदेश बिल्कुल साफ था: भारत अब उस रास्ते पर चल रहा है जहां विकास भी होगा और वन्यजीवों का संरक्षण भी। सरकार ने यह साफ कर दिया है कि विज्ञान, आधुनिक तकनीक और हमारे पुराने पारंपरिक ज्ञान को मिलाकर ही हम एक ऐसा भविष्य बना सकते हैं जहां इंसान और जानवर दोनों सुरक्षित रह सकें।

इस बैठक की सबसे बड़ी बातें और नए फैसले

इस उच्च स्तरीय बैठक में केवल विकास के कामों को मंजूरी देने पर ही बात नहीं हुई, बल्कि भारत के कुछ सबसे संकटग्रस्त जीवों को बचाने के लिए नए और वैज्ञानिक तरीकों पर भी मुहर लगाई गई। इस बैठक में मुख्य रूप से तीन जीवों के संरक्षण पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया गया:

१. एक सींग वाला गैंडा (Greater One-horned Rhinoceros)

असम के काजीरंगा और पश्चिम बंगाल के जंगलों में पाया जाने वाला एक सींग वाला गैंडा भारत की शान है। लेकिन सालों से शिकारी इनके सींगों के लिए इनका अवैध शिकार करते आ रहे हैं। इस बैठक में गैंडों को बचाने के लिए एक बेहद आधुनिक तकनीक की समीक्षा की गई, जिसे ‘राइनो डीएनए इंडेक्सिंग सिस्टम’ (Rhino DNA Indexing System) कहा जाता है। यह ठीक वैसे ही काम करता है जैसे इंसानों के मामलों को सुलझाने के लिए फॉरेंसिक साइंस काम करती है। हर गैंडे का एक अपना अनोखा डीएनए डेटाबेस तैयार किया जा रहा है। अगर कहीं भी कोई सींग या गैंडे का अवशेष मिलता है, तो वैज्ञानिक तुरंत पता लगा सकते हैं कि यह किस जंगल के किस गैंडे का है। इससे शिकारियों को पकड़ने और अदालतों में उन्हें सख्त सजा दिलाने में बहुत बड़ी मदद मिल रही है।

२. महान भारतीय सारंग (Great Indian Bustard)

यह पक्षी आकार में बहुत बड़ा होता है और मुख्य रूप से राजस्थान और गुजरात के सूखे इलाकों में पाया जाता है। आज के समय में यह पक्षी दुनिया के सबसे दुर्लभ और संकटग्रस्त जीवों में से एक है क्योंकि इनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक बची है। ऊंचे बिजली के तारों से टकराने और इनके रहने की जगह कम होने के कारण ये तेजी से खत्म हो रहे हैं। बैठक में इनके संरक्षण की भविष्य की रणनीति पर गंभीर मंथन हुआ, ताकि इन्हें पूरी तरह विलुप्त होने से बचाया जा सके।

३. पिग्मी हॉग (Pygmy Hog)

क्या आप जानते हैं कि दुनिया का सबसे छोटा जंगली सूअर भारत में पाया जाता है? इसे ‘पिग्मी हॉग’ कहते हैं और यह मुश्किल से १० इंच का होता है। यह जीव असम के ऊंचे घास के मैदानों में रहता है। इसकी संख्या इतनी कम हो चुकी है कि इसे बचाने के लिए अब सरकार ने इसे अपने विशेष ‘प्रजाति बहाली कार्यक्रम’ (Species Recovery Programme) में शामिल कर लिया है। इसके तहत इनके रहने की जगहों को दोबारा सुधारा जाएगा और इंसानी दखल को पूरी तरह रोका जाएगा।

१३१ प्रोजेक्ट्स की पहेली: आम जनता को क्या मिलेगा?

इस बैठक में जिन १३१ विकास प्रस्तावों पर विचार किया गया, वे कोई साधारण व्यावसायिक प्रोजेक्ट नहीं हैं। ये सीधे तौर पर भारत के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने से जुड़े हैं। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, १९७२ के तहत इन सभी कामों के लिए वन्यजीव बोर्ड की मंजूरी मिलना जरूरी होता है। आइए समझते हैं कि इन प्रस्तावों में क्या-क्या शामिल था:

  • सड़कें और पुल: कई आदिवासी और पहाड़ी गांवों तक पहुंचने के लिए आज भी पक्की सड़कें नहीं हैं। आपातकाल के समय या मरीजों को अस्पताल ले जाने के लिए इन सड़कों का बनना बेहद जरूरी है।
  • देश की सुरक्षा (Defence Infrastructure): सीमाओं के पास सुरक्षा बलों के आने-जाने और देश की रक्षा को मजबूत करने के लिए कुछ बंकरों, चौकियों और सड़कों के प्रस्ताव शामिल थे।
  • पीने के पानी की सप्लाई: ‘हर घर जल’ योजना के तहत जंगलों के रास्ते पाइपलाइन बिछाकर उन गांवों तक पानी पहुंचाना है जहां लोग आज भी पीने के पानी के लिए मीलों पैदल चलते हैं।
  • डिजिटल इंडिया (संचार टावर और ऑप्टिकल फाइबर): आज के दौर में इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क पढ़ाई और काम के लिए बिजली जितने ही जरूरी हो गए हैं। जंगलों के बीच बसे गांवों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए मोबाइल टावर और जमीन के नीचे ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाने की मंजूरी मांगी गई थी।
  • बिजली और स्वच्छ ऊर्जा (Renewable Energy): देश को चौबीसों घंटे बिजली देने के लिए ट्रांसमिशन लाइनें और प्रदूषण को कम करने के लिए सौर और पवन ऊर्जा के प्रोजेक्ट्स पर भी चर्चा की गई।

इतिहास का झरोखा: वन्यजीव संरक्षण का ऐतिहासिक सफर

भारत में पर्यावरण और वन्यजीवों को बचाने का इतिहास आज का नहीं है, यह हजारों साल पुराना है। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो हमें समझ आएगा कि भारतीय संस्कृति हमेशा से प्रकृति की पूजक रही है:

मौर्य काल और सम्राट अशोक की नीतियां

ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में, सम्राट अशोक दुनिया के पहले ऐसे शासक बने जिन्होंने बाकायदा कानून बनाकर जानवरों के शिकार पर रोक लगाई थी। उन्होंने अपने स्तंभों और शिलालेखों पर लिखवाया था कि जंगलों को बिना वजह जलाया नहीं जाना चाहिए और गर्भवती या छोटे बच्चों वाली पशु-प्रजातियों की हत्या पूरी तरह प्रतिबंधित है। उन्होंने जानवरों के इलाज के लिए बाकायदा अस्पताल भी बनवाए थे।

औपनिवेशिक काल (अंग्रेजों का शासन)

अंग्रेजों के आने के बाद भारत के जंगलों को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल गया। अंग्रेजों ने जंगलों को केवल ‘लकड़ी के गोदाम’ और कमाई का जरिया समझा। रेलवे लाइनें बिछाने और जहाजों के निर्माण के लिए भारत के लाखों हेक्टेयर घने जंगलों को बेरहमी से साफ कर दिया गया। इसके अलावा, मनोरंजन के नाम पर बाघों, शेरों और चीतों का बड़े पैमाने पर शिकार किया गया, जिससे भारत की जैव विविधता को ऐसा नुकसान हुआ जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है।

आजादी के बाद का नया दौर (१९७२ का कानून)

आजादी के बाद जब भारत ने देखा कि उसके जंगल और जानवर तेजी से गायब हो रहे हैं, तो साल १९७२ में एक ऐतिहासिक कानून बनाया गया जिसे ‘वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, १९७२’ कहा जाता है। इसी कानून ने देश में नेशनल पार्क और अभयारण्य बनाने की नींव रखी। इसके बाद ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ जैसी योजनाएं शुरू हुईं, जिन्होंने भारत को दुनिया के उन गिने-चुने देशों में खड़ा कर दिया, जहां शेर और बाघ दोनों आज भी जंगलों में खुलेआम घूमते हैं।

तुलनात्मक विश्लेषण: पुराना बनाम नया तरीका

आज का वन्यजीव संरक्षण पुराने तरीकों से बहुत अलग हो चुका है। पहले और आज के तौर-तरीकों में क्या अंतर आया है, इसे हम इस तालिका के जरिए आसानी से समझ सकते हैं:

पैमानापारंपरिक/पुराना तरीका (भूतकाल)आधुनिक दृष्टिकोण (वर्तमान ट्रेंड)
संरक्षण का तरीकाजंगलों के चारों तरफ बाड़ लगा देना और इंसानों को पूरी तरह बाहर रखना।स्थानीय लोगों को शामिल करना और ‘इको-टूरिज्म’ के जरिए उनकी कमाई बढ़ाना।
तकनीक का इस्तेमालकेवल जंगलों में पैरों के निशान (पगमार्क) देखकर जानवरों की गिनती करना।डीएनए इंडेक्सिंग, सैटेलाइट ट्रैकिंग, ड्रोन और कैमरा ट्रैप तकनीक का उपयोग।
विकास के प्रति सोचया तो केवल विकास करना या केवल पर्यावरण बचाना (दोनों के बीच टकराव)।सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत विकास): विकास भी होगा, लेकिन इको-फ्रेंडली अंडरपास और ओवरपास के साथ।
कानूनी सख्तीनियम थे लेकिन निगरानी के लिए पर्याप्त तकनीक और डेटा उपलब्ध नहीं था।जीआईएस (GIS) मैपिंग के जरिए हर प्रोजेक्ट की लाइव निगरानी की जाती है।

इस विश्लेषण से साफ है कि आज सरकार केवल जंगलों को बंद करके रखने के हक में नहीं है। आज का ट्रेंड यह है कि हम तकनीक का इस्तेमाल करके यह पता लगाएं कि जानवर किस रास्ते से जाते हैं, और उस रास्ते के ऊपर से या नीचे से सड़क निकाल दें, ताकि जानवरों को भी परेशानी न हो और इंसानों की गाड़ियां भी चलती रहें।

वर्तमान ट्रेंड्स: तकनीक और समाज का अनोखा संगम

केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने बैठक में जिस सबसे बड़ी बात पर जोर दिया, वह थी—”सॉल्यूशन-बेस्ड पॉलिसी यानी ऐसी नीतियां जो केवल कागजों पर न हों, बल्कि जमीन पर समस्याओं को सुलझाएं। इसके लिए सरकार तीन मुख्य स्तंभों पर काम कर रही है:

१. समाजशास्त्रीय अध्ययन (Sociological Studies)

जब तक जंगलों के आसपास रहने वाले लोग वन्यजीवों की सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानेंगे, तब तक कोई भी कानून जानवरों को नहीं बचा सकता। सरकार अब गांवों के लोगों को ‘फॉरेस्ट गार्ड’ और टूरिस्ट गाइड के रूप में नौकरी दे रही है। जब जंगलों के जीवित रहने से स्थानीय लोगों के घर का चूल्हा जलता है, तो वे खुद शिकारियों के सबसे बड़े दुश्मन बन जाते हैं।

२. पारंपरिक ज्ञान (Traditional Knowledge)

भारत के आदिवासियों के पास जंगलों और जड़ी-बूटियों का जो ज्ञान है, वह किसी बड़ी यूनिवर्सिटी की डिग्री से भी ज्यादा कीमती है। वे जानते हैं कि किस मौसम में जानवर कहां जाते हैं, कौन सा पौधा किस बीमारी को ठीक करता है और प्रकृति को नुकसान पहुंचाए बिना जंगल के संसाधनों का इस्तेमाल कैसे किया जाता है। सरकार अब इस ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ रही है।

३. इको-फ्रेन्डली इंफ्रास्ट्रक्चर

आजकल बनने वाले हाईवे और एक्सप्रेसवे पर विशेष ‘एनिमल ओवरपास’ (जानवरों के लिए पुल) बनाए जाते हैं। इन पुलों पर मिट्टी डाली जाती है और पेड़-पौधे उगाए जाते हैं ताकि जानवरों को लगे कि वे जंगल के अंदर ही चल रहे हैं। इसके नीचे से गाड़ियां बिना हॉर्न बजाए शांति से गुजर जाती हैं। कोयंबटूर की बैठक में भी यह तय किया गया कि जिन १३१ प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी जाएगी, उनमें ऐसे सुरक्षा उपाय करना अनिवार्य होगा।

निष्कर्ष: एक सुनहरे कल की उम्मीद

कोयंबटूर में हुई राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की ९१वीं बैठक इस बात का जीता-जागता सबूत है कि भारत अपनी प्राकृतिक विरासत को खोए बिना एक आधुनिक और विकसित राष्ट्र बनने की क्षमता रखता है। विकास और वन्यजीव के बीच की यह लड़ाई अब खत्म हो रही है, और उसकी जगह एक नया समझौता ले रहा है—जहां सड़कें भी बनेंगी, हर घर में इंटरनेट भी पहुंचेगा, और हमारे जंगलों में गैंडे, भालू और दुर्लभ पक्षी भी सुरक्षित तरीके से अपनी जिंदगी जी सकेंगे। यह हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम प्रकृति के इस संतुलन को बनाए रखने में सरकार और वैज्ञानिकों का साथ दें।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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