नई दिल्ली: राहुल गांधी ने बिहार के सासाराम से वोटर अधिकार यात्रा शुरू कर दी है। इससे पहले राहुल गांधी देश व्यापी भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा कर चुके हैं। दो हिस्सों में हुई इन दोनों यात्राओं के बूते भले ही कांग्रेस, केंद्र में सरकार न बना सकी हो लेकिन इससे राहुल गांधी की छवि में जरुर बदलाव आया है और बड़े स्तर पर लोगों में उनके प्रति धारणा बदली। बाद में इसका कांग्रेस को फायदा भी मिला।
लेकिन सवाल ये है कि क्या बिहार में वोट अधिकार यात्रा से विपक्ष, मोदी-नीतीश की जोड़ी को मात दे सकेगी ? दरअसल, कांग्रेस और आरजेडी समेत पूरा विपक्ष बिहार में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (विशेष गहन पुनरीक्षण ) के जरिए न सिर्फ चुनाव आयोग बल्कि एनडीए सरकार को घेर रहा है। हालांकि, एसआईआर का चुनाव नतीजों पर क्या असर होगा, ये तो बाद में पता चलेगा लेकिन इतना जरुर है कि राहुल गांधी, इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने में कामयाब हुए हैं। कर्नाटक के एक विधानसभा क्षेत्र के कथित फर्जी वोटों के मामले का उदाहरण देकर उन्होंने ये संदेश देने की कोशिश की है कि इससे जनमत का अपहरण हो सकता है। यही वजह है कि चुनाव आयोग को राहुल गांधी के आरोपों के खिलाफ खुद मैदान में उतरकर प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ी है।
लेकिन राहुल गांधी ये नेरेटिव तो सेट करने में कामयाब हुए ही है कि चुनाव में गड़बड़ियां हुई हैं और एसआईआर की कवायद भी इसी का हिस्सा हो सकती है। अब बिहार में चुनाव से ऐन पहले वोट अधिकार यात्रा शुरू करके राहुल गांधीअपने इसी नेरेटिव को जनता के बीच और मजबूत करने की कोशिश करेंगे। जाहिर है कि अगर ये नेरेटिव मजबूत हुआ तो इसका असर बिहार विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय है।

इसके बावजूद सवाल है कि क्या सिर्फ इसी से ही विपक्ष, चुनाव जीत पाएगा ? जरुरी नहीं है। पांच साल पहले चुनाव को याद करिए, ऐसा लगा था कि बाजी पलटने वाली है लेकिन एनडीए ने जीत हासिल कर ली। वजह थी, एनडीए की रणनीति। वोट अधिकार यात्रा, वोट चोरी या एसआईआर के मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाकर उन्हें लामबंद करने की कोशिश तो हो सकती है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए जब तक जमीनी स्तर पर रणनीति नहीं बनेगी, जीत आसान नहीं होगी। एनडीए के पास नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार जैसे बड़े चेहरे हैं। जाहिर है कि ये दोनों नेता अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। सरकारी योजनाओं का ऐलान होगा, हो भी रहा है और साथ ही मजबूत चुनाव प्रचार अभियान की रणनीति भी। उसका मुकाबला करने के लिए उम्मीदवारों के चयन से लेकर, गठबंधन, सीटों के बंटवारे और जाइंट कैंपेन के लिए तरीके नहीं अपनाए गए तो वोट अधिकार यात्रा और एसआईआर जैसे मुद्दे भी विपक्ष को सत्ता के किनारे पर नहीं ले जा सकेंगे।
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विपक्ष की जीत इस बात पर भी निर्भर करेगी कि विपक्षी गठबंधन की पार्टियां, एनडीए को मात देने के लिए किस हद तक सीटों की कुर्बानी देने को तैयार हैं। पिछले चुनाव में याद करिए, कांग्रेस कितनी सीटों पर लड़ी और कितनी पर जीती ? ऐसे में जरुरी है कि स्ट्राइक रेट पर विपक्ष को फोकस करना होगा। बिना बेहतरीन स्ट्राइक रेट के अगर विपक्षी पार्टियों ने चुनाव लड़ा तो एसआईआर जैसे मुद्दे भी उनकी मदद नहीं कर सकेंगे।



