नई दिल्ली: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट ने दुनिया के सामने एक गंभीर सच्चाई उजागर की है। विश्व जल सप्ताह 2025 के मौके पर जारी इस रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर हर चौथा व्यक्ति यानी करीब 2.1 अरब लोग आज भी सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। इसके अलावा, 3.4 अरब लोगों के पास सुरक्षित शौचालय की सुविधा नहीं है, और 1.7 अरब लोग बुनियादी स्वच्छता सेवाओं से भी महरूम हैं। यह संकट न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता को भी गहरा कर रहा है।
स्वच्छ पानी और शौचालय का अभाव: एक वैश्विक चुनौती
रिपोर्ट के मुताबिक, 10.6 करोड़ लोग नदियों, तालाबों या झीलों जैसे असुरक्षित स्रोतों से पानी पीने को मजबूर हैं। वहीं, 35.4 करोड़ लोग आज भी खुले में शौच करने को विवश हैं, जो उनकी गरिमा और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। इसके अलावा, 61.1 करोड़ लोगों के पास हाथ धोने जैसी बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं तक नहीं हैं। यह स्थिति विशेष रूप से कम विकसित देशों और ग्रामीण इलाकों में गंभीर है, जहां लोग बुनियादी सुविधाओं से सबसे ज्यादा वंचित हैं।
सबसे ज्यादा प्रभावित हैं गरीब और ग्रामीण समुदाय
रिपोर्ट में बताया गया है कि कम विकसित देशों में स्वच्छ पानी और शौचालय की पहुंच अन्य देशों की तुलना में आधी है। नाजुक और अस्थिर क्षेत्रों में यह अंतर और भी बड़ा है, जहां सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता 38% तक कम है। ग्रामीण इलाकों में पिछले एक दशक में कुछ सुधार हुआ है—2015 से 2024 तक स्वच्छ पानी की पहुंच 50% से बढ़कर 60% हो गई, और हाथ धोने की सुविधा 52% से 71% तक पहुंची। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में प्रगति ठप-सी है, जिससे असमानता और बढ़ रही है।
महिलाओं और लड़कियों पर सबसे ज्यादा बोझ
पानी और स्वच्छता की कमी का सबसे भारी बोझ महिलाएं और किशोरियां उठा रही हैं। अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में पानी लाने की जिम्मेदारी इन्हीं पर है, जिसके लिए वे रोजाना औसतन 30 मिनट से ज्यादा समय खर्च करती हैं। इससे उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर बुरा असर पड़ रहा है। माहवारी के दौरान पर्याप्त स्वच्छता सुविधाओं का अभाव किशोरियों को स्कूल और सामाजिक गतिविधियों से दूर रखता है। 70 देशों के आंकड़े बताते हैं कि माहवारी के समय बदलने के लिए जगह और सामग्री तो उपलब्ध है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
भारत की स्थिति और स्वच्छ भारत मिशन
रिपोर्ट में भारत के लिए नए आंकड़े शामिल किए गए हैं, जो शहरी क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता पर आधारित हैं। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत फरवरी 2025 तक 17% घर मल-अपशिष्ट उपचार संयंत्रों से जुड़ चुके हैं। खुले में शौच को खत्म करने की दिशा में भारत ने प्रगति की है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
2030 का लक्ष्य: क्या पूरा होगा सपना?
संयुक्त राष्ट्र ने सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के तहत 2030 तक हर व्यक्ति को स्वच्छ पानी, शौचालय और स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है। लेकिन मौजूदा गति से यह लक्ष्य मुश्किल लग रहा है। डब्ल्यूएचओ के विशेषज्ञ डॉ. रूडिगर क्रेच ने कहा, स्वच्छ पानी और शौचालय कोई विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी मानव अधिकार हैं। हमें तुरंत सबसे कमजोर समुदायों तक पहुंचना होगा। यूनिसेफ की सेसिलिया शार्प ने चेतावनी दी कि अगर बच्चों को सुरक्षित पानी और स्वच्छता नहीं मिली, तो उनकी सेहत, शिक्षा और भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।



