रंग से परे है सिंदूर की स्पिरिट, दृढ़ता, गरिमा व निरंतरता का जीवंत प्रतीक

शब्द ब्रह्म है। महर्षि पातंजलि ने तभी शब्दानुशासन की बात कही है। इसको विस्तार दे रहे हैं, वरिष्ठ पत्रकार सिद्धेश्वर शुक्ल एवं प्रो. बिष्णु मोहन दाश।

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नई दिल्ली: भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System) में शब्द की अवधारणा को ब्रह्म के स्तर तक प्रतिष्ठित किया गया है— शब्द-ब्रह्म— जिसे ध्वनि के रूप में अनुभूत परम सत्य माना गया है। ध्वनि को अभिव्यक्ति का शुद्धतम रूप माना गया है, जबकि पाठ अथवा लिखित शब्द तुलनात्मक रूप से निम्नतर है। मानव पर बोले गए शब्दों के महत्व और प्रभाव को रेखांकित करते हुए ऋग्वेद वाक् (भाषण या शब्द) को समस्त सृष्टि में व्याप्त एक ब्रह्मांडीय शक्ति के रूप में वर्णित करता है। आगे चलकर माण्डूक्य उपनिषद्, बृहदारण्यक उपनिषद्, संस्कृत व्याकरण ग्रंथों तथा शब्द-मीमांसा पर आधारित कृतियों में शब्द की अवधारणा का तकनीकी परिभाषण किया गया है, उसकी ज्ञानमीमांसा का विवेचन हुआ है तथा उसके सामाजिक-मानसिक और सांस्कृतिक महत्व को प्रतिपादित किया गया है।

हालांकि, पश्चिमी बौद्धिक उत्पादों के अंधाधुंध आयात ने इस प्रज्ञा को नष्ट कर दिया और अकादमिक क्षेत्र से लगभग मिटा ही दिया। नई पीढ़ियों को यह विश्वास दिलाया गया कि शब्द का महत्व केवल सतही और संकीर्ण है—‘नाम में क्या रखा है?’—और इस प्रकार भारतीय परंपरा द्वारा शब्द (ध्वनि) को दिए गए गहन ज्ञानमीमांसात्मक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक महत्व को नजरअंदाज कर दिया गया। इसी पृष्ठभूमि में, भारत में पश्चिमोन्मुखी बुद्धिजीविओं ने, भारतीय नागरिक होने के बावजूद, लगातार उन अवधारणाओं और विचारों को कमजोर करने का प्रयास किया है जो भारतीय भूमि से उत्पन्न हुए और विशेषकर उन विषयों से जुड़े हैं जिन्हें भारतीय ऋषि-मुनियों, चिंतकों, दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों और शिक्षाशास्त्रियों ने दिया।

एकता और सांस्कृतिक भाव के जागरण की ओर

इसी संदर्भ में, ऑपरेशन सिन्दूर—जो 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले (जिसमें 26 पर्यटकों की निर्मम हत्या कर दी गई) के प्रति उत्तर में नियंत्रण रेखा के पार और पाकिस्तान के भीतर गहराई तक फैले आतंकवादी ढांचे को ध्वस्त करने हेतु एक दंडात्मक और लक्षित अभियान के रूप में परिकल्पित किया गया। ऑपरेशन सिन्दूर की सफलता से भारतीय जनमानस में एक “सिन्दूर स्पिरिट” आकर ले रही है। यह भारतीय जीवन-दृष्टि में गहराई से निहित विभिन्न अवधारणाओं के पुनर्जागरण और भारतीयता की आत्मा के मूर्त रूप के रूप में आशा की किरण बनकर उभर रही है। संसद में ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ पर हुए ऐतिहासिक विमर्श के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जोर देकर कहा कि अब देश ‘सिन्दूर स्पिरिट’ से ओत-प्रोत है। उन्होंने कहा—“हमने इस भावना को तब देखा जब हमारे प्रतिनिधि भारत का पक्ष दुनिया के सामने रखने गए। मैं प्रत्येक को बधाई देता हूं।” उन्होंने इस भावना को राष्ट्रहित में दलगत सीमाओं से परे सभी सांसदों की एकता के रूप में परिभाषित किया।

यह उल्लेखनीय है कि सिन्दूर जिसे भारतीय महिलाएं, विशेषकर हिंदू विवाहित स्त्रियां सुहाग के प्रतीक के रूप में अपनी मांग में सजाती हैं, सदियों से विवाह, समर्पण, मंगलमयता और परंपरा की निरंतरता का प्रतीक रहा है। सिन्दूर को मात्र एक सौंदर्य प्रसाधन या अनुष्ठानिक चिह्न मानना इसके गहरे सार को नज़रअंदाज़ करना होगा। सिन्दूर के रंग से परे एक जीवित प्रतीक है—सिन्दूर स्पिरिट—जो दृढ़ता, सांस्कृतिक पहचान, आध्यात्मिक निरंतरता और सामाजिक अर्थ का जीवंत प्रतीक है। इतिहासकारों ने इसके अस्तित्व को सिंधु घाटी सभ्यता तक खोज निकाला है, जहां हड़प्पा से प्राप्त स्त्री मूर्तियों पर इस सांस्कृतिक चिह्न के प्रमाण मिलते हैं। दुर्भाग्यवश, भारत और विदेशों में बसे मार्क्स एंड मैकाले के मानसपुत्रों ने इस सदियों पुराने आचरण पर लगातार प्रहार किया है और आधुनिक नारीवाद के बंकरों की आड़ से इसकी निंदा की है। उनका यह सतत अभियान इस सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता का उपहास उड़ाने तक जा पहुंचा है।  

‘ऑपरेशन सिन्दूर’ की सफलता और उससे उत्पन्न विमर्शों ने भारत और विदेशों की सिन्दूर-धारण करने वाली स्त्रियों को इस संस्कृति की धार्मिकता और न्यायोचितता की रक्षा हेतु प्रचुर सकारात्मक तर्कों से समर्थित किया है।

आयातित विकृतियों से भारतीय जीवन-दृष्टि की रक्षा

यह पहला अवसर नहीं है जब प्रधानमंत्री ने भारतीय जीवन-दृष्टि में निहित किसी शब्द को पश्चिमोन्मुखी बुद्धिजीविओं के निरंतर प्रहार से बचाकर उसके यथोचित स्थान पर पुनः प्रतिष्ठित किया हो। इससे पहले, उन्होंने 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर लैंडिंग स्थल का नाम “शिव शक्ति पॉइंट” रखा था। किंतु भारतीय शब्दों की पुनर्स्थापना का दाईत्व अकेले प्रधानमंत्री पर छोड़ देना उचित नहीं है।  हम सबको इस महायज्ञ में अपनी अपनी आहुति देने का संकल्प लेना होगा।

यदि शिक्षाविद् स्वेच्छा से इस उत्तरदायित्व को स्वीकार करें तो हम उन अनेक शब्दों को संरक्षित कर सकते हैं जिन्हें समय के साथ एक गुप्त एजेंडा के तहत विकृत किया गया ताकि लोगों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से अलग कर राष्ट्र के विरुद्ध खड़ा किया जा सके। निरंतर भ्रामक सूचनाओं के माध्यम से इन आयातित व्याख्याओं ने न केवल भारतीय अवधारणाओं को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया है बल्कि एक झूठा आख्यान इतनी गहराई से आरोपित कर दिया है कि जब भारतीय कोई जघन्य अपराध भी करते हैं तो उन्हें अपनी संस्कृति को ही उस त्रासदी के लिए दोषी ठहराने को प्रेरित किया जाता है।

दहेज ऐसा ही एक आयातित शब्द है जिसे कपटपूर्ण ढंग से दान के साथ जोड़ दिया गया। दान —अर्थात् अपनी सर्वश्रेष्ठ वस्तु का स्वेच्छा से अर्पण—संस्कृत परंपरा में निहित है और एक प्राचीन सांस्कृतिक मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है। दूसरी ओर, दहेज  शब्द अरबी के जिहाज से आया है, जो फ़ारसी के रास्ते हिंदी में पहुंचा। मूल रूप से पुत्री को दिया गया स्नेहिल उपहार, दान  को दहेज के साथ मिलाकर शीघ्र ही वधू-पक्ष के शोषण और ससुराल वालों द्वारा उगाही में परिवर्तित कर दिया गया। 1986 में भारतीय संसद को “दहेज मृत्यु” को अपराध घोषित करने के लिए विवश होना पड़ा और इसमें पति व उसके परिजनों द्वारा की जाने वाली अमानवीय क्रूरता पर सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान किया गया। किंतु 1990 के दशक में यह समस्या महामारी की तरह फैल गई. हजारों पत्नियों की हत्या हुई और लाखों पुरुष व उनके परिवार जेल में डाल दिए गए। दशकों से कानूनी प्रावधानों और सामाजिक जागरूकता के बावजूद यह अभिशाप आज भी बना हुआ है।

भारतीय परिवार प्रणाली की अवधारणाएँ इतनी विकृत कर दी गई हैं कि नई पीढ़ी विवाह और परिवार को संदेह या नकारात्मकता की दृष्टि से देखने लगी है। शहरी भारत में अब हजारों युवक-युवतियां पारंपरिक विवाह संस्था के बजाय लिव-इन रिलेशनशिप को प्राथमिकता दे रहे हैं। कभी पूज्यनीय रहे पति और पत्नी जैसे शब्द आज इतने हल्के बना दिए गए हैं कि ये प्रायः केवल चुटकुलों और व्यंग्य में प्रयुक्त होते हैं, प्रायः कटुता या उपहास प्रकट करने हेतु। मीडिया आख्यान इस धारणा को और गहरा कर देते हैं, जहां अक्सर पत्नियों के अपने प्रेमियों के साथ षड्यंत्र कर पति की हत्या करने के सनसनीखेज मामले उजागर किए जाते हैं। इसी बीच, “प्रेम” का सामाजिक-सांस्कृतिक सार—जो कभी विश्वास, त्याग और संग-साथ पर आधारित था—अब केवल वासना में सीमित कर दिया गया है, जहां साथी को शारीरिक तृप्ति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाया जाता है।

इसी प्रकार, गर्भावस्था को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और गर्भवती स्त्री को परिवार में विशेष अनुभव दिलाने के लिए परंपराएँ प्रचलित हैं। ससुराल और मायके दोनों ओर से—पुरुष और स्त्रियाँ समान रूप से—उस पर स्नेह और देखभाल बरसाते हैं तथा उसे उत्तम से उत्तम पोषण उपलब्ध कराते हैं। उसे प्रसन्न रखने के लिए गीत गाए जाते हैं, नृत्य किया जाता है और आनंदमय वातावरण बनाया जाता है, क्योंकि यह माना जाता है कि सुख और प्रसन्नता स्वस्थ गर्भावस्था तथा शिशु के समुचित विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है—और अब आधुनिक विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है।

किन्तु, जैसे ही वह अस्पताल के द्वार पर पहुंचती है, उसे “पेशेंट” (मरीज़) कहा जाने लगता है, मानो वह किसी बीमारी से ग्रस्त हो! आखिर उसे मरीज़ कहकर क्यों पुकारा जाता है? गर्भावस्था न तो कोई रोग है, न व्याधि, और न ही चोट। यह मानसिकता उस नकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसे हमने बिना सोचे-समझे पश्चिम से आयात कर लिया है।

इसी प्रकार, कास्ट (caste) शब्द भी भारतीय शब्दावली में अंग्रेज़ी के माध्यम से पुर्तगाली से आया और उसे संस्कृत के जाति के साथ जोड़ दिया गया।  संस्कृत का जाति शब्द मूलरूप में अंग्रेजी के स्पीशीज (species)  से मिलता जुलता है। आधुनिक जातिवाद की समस्या समय के साथ और गंभीर होती गई। जाट, यादव, गुज्जर और मराठा जैसी समुदायें कभी अपने क्षेत्र में प्रभावशाली परिवार माने जाने पर गर्व करती थीं, किंतु आज अनेक बार वे स्वयं को पीड़ित समुदाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं।  

इसी तरह, वह देश जिसका सर्वोच्च सामाजिक आदर्श था—“नर सेवा, नारायण सेवा”—आज संगठित धर्मांतरण अभियानों का सामना कर रहा है, जिन्हें झूठी सेवा और गढ़ी हुई समानता के नाम पर चलाया जा रहा है। सनातन धर्म, जिसने सदियों तक शास्त्रार्थ की खुली परंपरा को पोषित किया—जहाँ आध्यात्म से लेकर समाज तक के विषयों पर निर्बाध प्रश्न पूछने की परंपरा थी—आज एकतरफा आलोचना और लक्षित धर्मांतरण का शिकार हो रहा है। यह विकृतियों की उस लंबी सूची का केवल केवल कुछ उदहारण हैं।

निष्कर्ष

सिन्दूर के रंग से परे है सिन्दूर स्पिरिट—जो दृढ़ता, गरिमा और निरंतरता का जीवंत प्रतीक है। यह स्मृति, पहचान और शक्ति का संवाहक है, जो समय और संदर्भ से परे अर्थ को धारण करता है।
यह मात्र परंपरा नहीं, बल्कि कर्तव्य, करुणा और सशक्तिकरण का दर्शन है। इन गुणों को भारत की सामाजिक कार्य शिक्षा (Social Work Education) में समाहित कर, हम और भी अनेक विकृत शब्दों को बचा सकते हैं। यहाँ सामाजिक कार्य शिक्षा को संप्रेषण तथा विभिन्न सामाजिक आचरणों के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। यह भारतीय समाज की विविध अवधारणाओं को बचाने और उन्हें उनके मूल स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठित करने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।

(सिद्धेश्वर शुक्ल एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और प्रो. विष्णु मोहन दाश दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. भीम राव आंबेडकर कॉलेज में समाज कार्य विभाग के अध्यक्ष हैं)

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