नई दिल्ली: बातों-बातों में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र का नाम सुनते ही अमरदीप के चेहरे पर चमक आ गई। वह इस केंद्र की खूबियां बताने लगे। कहा, गैस की दवा मेडिकल स्टोर में 250 रुपये में मिल रही थी। मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि एक महीने की दवा खरीद सकूं। सोचा इस बार पीएम जन औषधि केंद्र से खरीदता हूं। देखता हूं कि कितनी सस्ती दवा मिल रही है। वहां 20 रुपये में ही दवा मिल गई। अब तो हर दवा वहीं से लेता हूं…
यह बचत सिर्फ अमरदीप की नहीं हुई है, देशभर में तमाम लोग हैं, जिनके लिए पीएम जन औषधि केंद्र से इलाज संभव हो पाया है। केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने लोकसभा में बताया कि नागरिकों को लगभग 38,000 करोड़ रुपये बचत होती है।
दो से ज्यादा दवाएं मिलती हैं
सरकार ने सभी को किफायती दामों पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाइयां मिलें, इसके लिए लिए प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना शुरू की थी। इस केंद्र पर ब्रांडेड दवाओं की तुलना में लगभग 50 से 80 फीसदी सस्ती दवाइयां मिलती हैं। योजना के अंतर्गत 2,110 दवाइयां और 315 सर्जिकल, चिकित्सा से जुड़ीं वस्तुएं और उपकरण उपलब्ध हैं। हार्ट, कैंसर, मधुमेह, संक्रमण, एलर्जी और जठरांत्र जैसी बीमरियों कीर दवाएं और और न्यूट्रास्युटिकल्स प्रोडक्ट मिलेत हैं।
देशभर में होंगे 20 हजार केंद्र
इस योजना के अंतर्गत, 30 जून 2025 तक कुल 16,912 जन औषधि केंद्र (जेएके) खोले जा चुके हैं। इनमें से 1,432 केंद्र तमिलनाडु में खोले गए हैं। सरकार ने 31 मार्च 2026 तक जेएके की संख्या बढ़ाकर 20,000 करने का निर्णय लिया है। नए जन औषधि केंद्र खोलने के लिए राज्य और केंद्र शासित प्रदेशवार कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं है।
आपकी बचत के लिए सरकार कर रही जागरूक
लोग निजी डॉक्टरों और निजी कंपनियों की दवाओं के जाल में न फंसें, इसके लिए सरकार जागरूकता अभियान भी चला रही है। दरअसल, कुल प्रैक्टिसनर अपने केबिन के बाहर या आसपास खुले मेडिकल स्टोर से ही दवा लेने के लिए बाध्य करते हैं जहां प्रिंट रेट पर दवाएं मिलती हैं। ऐसे डॉक्टर जिस कंपनी की दवा लिखते हैं, उस कंपनी की दवा अन्य मेडिकल स्टोर पर कम ही मिलती है। दरअसल यह सब मेडिकल स्टोर संचालक, कंपनी के एमआर और डॉक्टर के बीच साठगांठ से होता है। इससे मरीजों को औने -पौने दामों पर दवाएं बेची जाती हैं।
इस पर लगाम लगाने और मरीजों का पैसा बचाने के लिए सरकार ने प्रधानमंत्री जन औषधि परियोजना शुरू की थी। इसके प्रति लोगों को मीडिया, सोशल मीडिया समेत अन्य माध्यमों से जागरूक भी कर रही है। हर वर्ष 7 मार्च को जन औषधि दिवस मनाया जाता है।
स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने सभी केंद्रीय सरकारी अस्पतालों को केवल जेनेरिक दवाइयां लिखने का निर्देश दिया है और सभी केंद्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) डॉक्टरों और कल्याण केंद्रों को जेनेरिक नाम वाली दवाएं लिखने के लिए भी इसी तरह के निर्देश जारी किए गए हैं।
भारतीय चिकित्सा परिषद (पेशेवर आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम, 2002 में चिकित्सा आचार संहिता के पैराग्राफ 1.5 में कहा गया है कि प्रत्येक चिकित्सक को जेनेरिक नामों वाली दवाएं स्पष्ट रूप से लिखनी चाहिए और उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दवाओं का तर्कसंगत नुस्खा और उपयोग हो। भारतीय चिकित्सा परिषद ने 22 नवंबर 2012, 18 जनवरी 2013 और 21 अप्रैल 2017 के परिपत्र के अलावा समय-समय पर जरूरी दिशा-निर्देश जारी करती रहती है।
बढ़ेगी दवाओं की संख्या
इस योजना के अंतर्गत उत्पाद शृंखला को 31 मार्च 2026 तक 2,200 दवाओं और 320 शल्य चिकित्सा, चिकित्सा से जुड़ी सामग्रियों और उपकरणों तक विस्तारित करने का निर्णय लिया गया है।
विश्वसनीय होती हैं दवाएं
अकसर लोगों के जेहन में सवाल उठता है कि जन औषधि केंद्र की दवाएं फायदा करेंगी या नहीं? इसका जवाब केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की दी गई जानकारी में है।
पहला: दवाइयां केवल विश्व स्वास्थ्य संगठन-अच्छे विनिर्माण अभ्यास (डब्ल्यूएचओ- जीएमपी) द्वारा प्रमाणित आपूर्तिकर्ताओं से ही खरीदी जाती हैं।
दूसरा: दवाओं के प्रत्येक बैच का परीक्षण राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशांकन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीएल) द्वारा मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में किया जाता है और गुणवत्ता परीक्षण में सफल होने के बाद ही दवाओं को जन औषधि केंद्रों को भेजा जाता है। तीसरा-विक्रेताओं की सुविधाओं का गुणवत्ता ऑडिट नियमित रूप से भारतीय औषधि एवं चिकित्सा उपकरण ब्यूरो द्वारा किया जाता है।



