नई दिल्ली: 21वीं सदी भारत जैसे देशों के लिए दोहरी जिम्मेदारी लेकर आई है: एक युवा और महत्वाकांक्षी जनसंख्या की विकासात्मक आकांक्षाओं को पूरा करना और साथ ही, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के नुकसान और पारिस्थितिक क्षरण के प्रभावों से पृथ्वी की रक्षा करना।सरकारों, उद्योग, नियामकों, वैश्विक वित्तीय संस्थानों और नागरिकों के बीच सहयोगात्मक विकास, समावेशी आर्थिक विकास सुनिश्चित करते हुए जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करने की कुंजी है। ये बातें केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने फिक्की “लीड्स” सम्मेलन के चौथे संस्करण के संबोधन में कहीं। उन्होंने बल दिया कि भविष्य की अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण का मार्ग प्रगति और लाभ को स्थिरता के साथ जोड़ने पर निर्भर करता है, जिसमें लोगों और पारिस्थितिकी प्रणाली को विकास के केंद्र में रखा जाता है।
पर्यावरणीय लागतों के प्रति भी सचेत रहना चाहिए
उन्होंने औद्योगीकरण और प्रगति की उस यात्रा से परिचय कराया जिसने दो शताब्दियों में वैश्विक पर्यावरणीय क्षरण में योगदान दिया है। उन्होंने बताया कि 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता वैश्विक तापमान केवल जलवायु विज्ञान का ही प्रतीक नहीं हैं बल्कि असंवहनीय विकास के परिणामों का भी संकेत हैं। उन्होंने कहा कि उद्योगो को न केवल अपने लाभ के आंकड़ों के प्रति, बल्कि उनके पीछे छिपी पर्यावरणीय लागतों के प्रति भी सचेत रहना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हरित वित्त को एक विशिष्ट हस्तक्षेप के रूप में नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी और सतत अर्थव्यवस्थाओं के केंद्र के रूप में देखा जाना चाहिए। इसमें पूंजी प्रवाह का पुनर्गठन शामिल है ताकि बुनियादी ढांचे, कृषि, परिवहन या उद्योग में हर निवेश न केवल आर्थिक लाभ प्रदान करे, बल्कि साथ ही साथ स्थिरता को भी मज़बूत करे। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हरित वित्त पोषण को ऐसी आर्थिक प्रणालियां बनानी चाहिए जिनमें विकास पारिस्थितिक कल्याण और समुदायों के स्वास्थ्य के साथ जुड़ा हो।
हरित निवेश के लिए भारत ने उठाएं हैं कई कदम
– सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड जारी करना, जिसने व्यापक अंतरराष्ट्रीय रुचि आकर्षित की है, भारत की हरित विकास क्षमता में दृढ़ विश्वास का प्रमाण बताया गया।
– भारतीय रिज़र्व बैंक और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड जैसे नियामक भी हरित उपकरणों में ज़िम्मेदारीपूर्ण प्रकटीकरण, उत्तरदायिता और पारदर्शिता को प्रोत्साहन देने के लिए कार्रवाई तेज़ कर रहे हैं, जिससे इस क्षेत्र में दीर्घकालिक विश्वास और स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
– भारत मिश्रित वित्त प्रणाली को बढ़ावा दे रहा है जो नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, विद्युत गतिशीलता, अपशिष्ट से धन और प्रकृति-आधारित समाधानों में निजी निवेश को जोखिम मुक्त करने और तेज़ करने के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग करता है।
– भारत को अपने शुद्ध शून्य लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वर्ष 2070 तक 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की आवश्यकता होगी, ऐसी प्रणाली महत्वपूर्ण हैं।
मंत्री ने बताए तीन सिद्धांत
पहला: जलवायु वित्त को विकास वित्त से अलग नहीं किया जा सकता।
दूसरा: स्वच्छ ऊर्जा, कुशल शहर, जलवायु-अनुकूल कृषि और लचीला बुनियादी ढांचा केवल अतिरिक्त नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता की नींव हैं। तीसरा: जो देश आज हरित निवेश जुटाएंगे, वे भविष्य में उद्योग और व्यापार की मूल्य श्रृंखलाओं का नेतृत्व करेंगे।
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ग्लोबल साउथ का समर्थन नैतिक ज़िम्मेदारी
उन्होंने कहा कि विकसित देशों की ग्लोबल साउथ का समर्थन करने की नैतिक ज़िम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2035 तक 300 अरब अमेरिकी डॉलर का यूएनएफसीसीसी प्रक्रिया लक्ष्य अपर्याप्त है और चुनौती के पैमाने को प्रतिबिंबित नहीं करता है। केंद्रीय मंत्री ने नवीकरणीय ऊर्जा के व्यापक विस्तार, एक जीवंत स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी प्रणाली और नवाचार का नेतृत्व करने के लिए तैयार युवा, कुशल जनसंख्या के साथ सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की मज़बूत स्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सौर और पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, सतत कृषि, चक्रीय अर्थव्यवस्था और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचे जैसे क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देने में हरित वित्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इन क्षेत्रों में लाखों रोज़गार सृजित करने, प्रतिस्पर्धात्मकता को मज़बूत करने और भारत के ऊर्जा भविष्य को सुरक्षित करने की क्षमता है।



