वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 3 प्रावधानों पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ की कुछ धाराओं पर आंशिक रोक लगाई है। मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि उन्होंने प्रत्येक धारा को दी गई प्रथम दृष्टया चुनौती पर विचार किया है।

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून के कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगा दी है। अब कलेक्टर को प्रॉपर्टी विवाद पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं होगा। हालांकि, यह रोक तब तक के लिए है, जब तक कि संशोधन की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस मामले में अंतरिम राहत पर फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने 22 मई को फैसला सुरक्षित रखा था। सोमवार को शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि कानून के संपूर्ण प्रावधानों पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं है, लेकिन कुछ धाराओं पर अंतरिम संरक्षण जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने 3 मुद्दों पर अंतरिम रोक लगाई

वक्फ यूजर डिनोटिफिकशन पर रोक

कलेक्टर की शक्ति पर रोक

गैर-मुस्लिमों को शामिल करने पर रोक

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हम यह भी मानते हैं कि वक्फ बोर्ड में 3 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं होने चाहिए और कुल मिलाकर 4 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं होने चाहिए। इस मामले में सीजेआई बी आर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने अपना फैसला सुनाया। सीजेआई ने कहा कि उन्होंने दलील सुनी थी कि क्या पूरे संशोधन अधिनियम पर रोक लगाई जाए या नहीं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उन्होंने माना है कि पूर्वधारणा हमेशा क़ानून की संवैधानिकता के पक्ष में होती है ⁠और हस्तक्षेप केवल दुर्लभतम मामलों में ही किया जाता है।

वक्फ प्रावधानों पर रोक लगाने से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 के उस प्रावधान पर रोक लगा दी है जिसके तहत वक्फ बनाने के लिए किसी व्यक्ति को 5 साल तक इस्लाम का अनुयायी होना ज़रूरी था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह प्रावधान तब तक स्थगित रहेगा जब तक यह तय करने के लिए नियम नहीं बन जाते कि कोई व्यक्ति इस्लाम का अनुयायी है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के सभी प्रावधानों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. हालांकि, कोर्ट का कहना है कि कुछ धाराओं को संरक्षण की ज़रूरत है।

कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने क्या कहा

कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने कोर्ट के फैसले पर कहा कि यह वाकई एक अच्छा फ़ैसला है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की साज़िश और इरादों पर लगाम लगा दी है। ज़मीन दान करने वाले लोग इस बात से डरे हुए थे कि सरकार उनकी ज़मीन हड़पने की कोशिश करेगी। यह उनके लिए राहत की बात है…सरकार कैसे तय करेगी कि कौन 5 साल से धर्म का पालन कर रहा है? यह आस्था का मामला है। सरकार ने इन सभी पहलुओं पर ध्यान दिया है. हम लड़ाई जारी रखेंगे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्या कुछ बोले वकील

एडवोकेट अनस तनवीर (वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ता) ने कहा, “सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार पाया है कि कुछ प्रावधानों पर रोक लगाने का प्रथम दृष्टया मामला बनता है। उन्होंने सभी प्रावधानों या पूरे अधिनियम पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई है, जैसे कि वह प्रावधान जिसमें कहा गया था कि आपको 5 साल तक मुस्लिम होना चाहिए, उस पर रोक लगाई गई है क्योंकि यह निर्धारित करने का कोई तंत्र नहीं है कि कोई व्यक्ति 5 साल से मुस्लिम है या नहीं जहां तक ​​गैर-मुस्लिम सदस्यों का सवाल है, अदालत ने कहा है कि वक्फ बोर्ड में, यह 3 से अधिक नहीं हो सकता और धारा 9 में 4 से अधिक नहीं हो सकता है और पंजीकरण पर, अदालत ने स्पष्ट रूप से समय सीमा बढ़ा दी है लेकिन प्रावधान पर रोक नहीं लगाई है।

इस आवश्यकता पर तब तक रोक लगा दी गई है जब तक कि राज्य द्वारा यह जांचने के लिए नियम नहीं बनाए जाते कि व्यक्ति मुस्लिम है या नहीं। अदालत ने कहा कि ऐसे किसी नियम/तंत्र के बिना, यह प्रावधान मनमाने ढंग से सत्ता का प्रयोग करेगा।

कलेक्टर को नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों का फैसला करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन होगा। ट्रिब्यूनल द्वारा फैसला होने तक, किसी भी पक्ष के विरुद्ध कोई तृतीय पक्ष अधिकार सृजित नहीं किया जा सकता। कलेक्टर को ऐसी शक्तियों से संबंधित प्रावधान पर रोक रहेगी।

अदालत ने वक्फ निकायों में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने के प्रावधान पर भी विचार किया। अदालत ने आदेश दिया कि फिलहाल, राज्य वक्फ बोर्ड में 3 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल नहीं किए जाएंगे और केंद्रीय वक्फ बोर्ड में कुल मिलाकर 4 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल नहीं किए जाएंगे।

कोर्ट ने क्या कुछ कहा

हालांकि अदालत ने वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण की आवश्यकता पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, यह देखते हुए कि यह पहलू पहले के कानूनों में भी मौजूद है। पंजीकरण के लिए निर्धारित समय सीमा में संशोधन की आवश्यकता की चिंता के जवाब में, अदालत ने कहा कि उसने अपने आदेश में इस पहलू पर विचार किया है। मुख्य न्यायाधीश ने अंतरिम आदेश के प्रभावी अंशों को लिखवाते हुए कहा कि हमने माना है कि पंजीकरण 1995 से 2013 तक अस्तित्व में था और अब भी है. इसलिए हमने माना है कि पंजीकरण कोई नई बात नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल प्रथम दृष्टया प्रकृति की हैं और वे पक्षों को अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाले आगे के तर्क प्रस्तुत करने से नहीं रोकेंगी।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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