गयाजी : शारीरिक चुनौतियां भले ही कितनी क्यों न हों, लेकिन अगर लक्ष्य तक पहुंचने का जुनून और हौसला हो तो उसके आगे सभी मुश्किलें छोटी साबित होती हैं। इसकी मिसाल हैं 3 फीट के संतोष कुमार, जो मगध प्रमंडल के औरंगाबाद जिले के रहने वाले हैं। संतोष इन दिनों 2027 में ऑस्ट्रेलिया में होने वाले वर्ल्ड ड्वार्फ गेम्स की तैयारी में जुटे हैं। यह प्रतियोगिता खासतौर पर छोटे कद (ड्वार्फ) खिलाड़ियों के लिए होती है। इसमें संतोष दौड़ और शॉटपुट (गोला फेंक) में हिस्सा लेंगे।
रनिंग और शॉटपुट उनका मुख्य खेल है। रनिंग में वे 100 मीटर और 200 मीटर में दौड़ लगाते हैं, जबकि शॉटपुट में 7 किलो का गोला फेंकते हैं। वे जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय खेलों तक हिस्सा ले चुके हैं। संतोष ने पैरालंपिक गेम्स और छोटे कद के खिलाड़ियों की विशेष अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता वर्ल्ड ड्वार्फ गेम्स में भी देश का प्रतिनिधित्व किया है।

कद से बड़ा मेडल
संतोष ने 2005 में खेल की शुरुआत की थी। पहली बार उन्होंने ‘निशक्त’ नाम से पटना में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लिया। यहां अच्छे प्रदर्शन के कारण उन्हें तमिलनाडु में होने वाले नेशनल गेम्स के लिए चुना गया, जहां उन्होंने पहला गोल्ड मेडल जीता। उस प्रतियोगिता में उन्होंने गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज- कुल तीन पदक अपने नाम किए। यहीं से उनकी मेडल जीतने की यात्रा शुरू हुई, जो अब तक जारी है। आज संतोष जिला, राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 100 मेडल जीत चुके हैं, जिनमें 12 गोल्ड भी शामिल हैं।
आसान नहीं था कामयाबी का सफर
संतोष औरंगाबाद जिले के रफीगंज थाना क्षेत्र के बड़सार गांव के रहने वाले हैं। वे किसान अशोक कुमार सिंह और नीलम देवी के छह संतानों में दूसरे नंबर पर हैं। तीन भाइयों और दो बहनों में उनका कद सबसे छोटा है। पिता की लंबाई 6 फीट और मां की 5 फीट से ज्यादा है, इसलिए संतोष का कद छोटा होना जेनेटिक कारणों से नहीं माना जा सकता।
संघर्षों को याद करते हुए संतोष बताते हैं कि बचपन में जब उनका कद नहीं बढ़ा तो माता-पिता चिंतित हो गए। बड़े होने पर वे खुद निराश रहते थे। हालांकि माता-पिता ने उन्हें पढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। संतोष कहते हैं- “मैं खुद दिन-रात पढ़ाई करता था, लेकिन समाज की संकीर्ण सोच के कारण अक्सर निराश होता था। मैं अपने क्षेत्र का पहला बौना बच्चा था, जिसकी वजह से स्कूल और बाहर दोनों जगह मुश्किलें झेलनी पड़ती थीं।”

कोई साथ खेलने वाला नहीं था
संतोष बताते हैं- “बचपन में मेरे साथ पढ़ने वाले बच्चे खेलते नहीं थे। मुझे याद है कि मैं हर रात भगवान से प्रार्थना करता था कि अगले दिन कोई नई चुनौती न मिले। शायद भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली, तभी मैं आज सफल हूं। भाई-बहनों में मैं और एक भाई ही सरकारी नौकरी में हैं। मैं शिक्षक हूं और मेरा भाई रेलवे में कार्यरत है।”
खेल के प्रति अपने जुनून को याद करते हुए संतोष कहते हैं कि वे बचपन से क्रिकेट खेलना चाहते थे और सचिन तेंदुलकर व सुनील गावस्कर के बड़े फैन थे। लेकिन गांव में जब वे खेलने जाते तो छोटे कद की वजह से लोग उन्हें भगा देते। इंटर तक पढ़ाई करने के बाद उनके माता-पिता ने उन्हें पटना यूनिवर्सिटी भेजा, जहां उन्होंने बीएड तक की पढ़ाई पूरी की।
11 सेकंड में 60 मीटर दौड़ का वर्ल्ड रिकॉर्ड
संतोष ने पहली बार 2005 में निशक्त खिलाड़ियों के साथ प्रतियोगिता में भाग लिया। पिछले साल ही वे जर्मनी में आयोजित वर्ल्ड ड्वार्फ चैंपियनशिप से लौटे हैं। वहां उन्होंने 60 मीटर दौड़ में गोल्ड मेडल जीता और वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया। उन्होंने यह दूरी सिर्फ 11 सेकंड में पूरी की थी। इसी प्रतियोगिता में शॉटपुट में वे दूसरे स्थान पर रहे।
2011 में बने शिक्षक
संतोष बताते हैं कि 2005 में जब उन्होंने खेलना शुरू किया था तब बिहार में ‘मेडल लाओ, नौकरी पाओ’ जैसी नीति नहीं थी। चूंकि उन्होंने बीएड किया था, इसलिए शिक्षक भर्ती परीक्षा दी और 2011 में शिक्षक बने। वे कहते हैं—“लोग जब मुझे बौना कहते थे तो दुख होता था, लेकिन बाद में समझ आया कि यह जानकारी की कमी है। तभी मैंने तय किया कि शिक्षक बनूंगा ताकि समाज दिव्यांग और छोटे कद के लोगों को सम्मान देना सीखे।”
‘मैं शिक्षक हूं, पर बौना कहलाता हूं’
संतोष कहते हैं- “मैं ज्ञान बांटता हूं, लेकिन आज भी कुछ लोग मुझे बौना कहकर बुलाते हैं। मुझे अच्छा नहीं लगता। मेरा कद छोटा जरूर है, लेकिन मैंने 5 फीट और 6 फीट वालों से ज्यादा सफलता हासिल की है। मैंने कई देशों में जाकर भारत और बिहार का नाम रोशन किया है। हमारे गेम्स छोटे कद के खिलाड़ियों के लिए होते हैं और इनमें कई देशों के खिलाड़ी भाग लेते हैं। इसके बावजूद समाज हमें मजाक का पात्र मानता है। लोगों को समझना होगा कि मैं ‘गुरुजी’ और खिलाड़ी हूं और सम्मान का हकदार हूं।”
बिहार सरकार से मिला सम्मान
2023 में संतोष को बिहार सरकार ने 5 लाख रुपये देकर सम्मानित किया। उन्हें शिक्षा मंत्रालय से भी शिक्षक के रूप में सम्मान मिल चुका है। वे अब तक 100 से ज्यादा मेडल और कई अवॉर्ड जीत चुके हैं। वर्तमान में उनका पूरा ध्यान 2027 में ऑस्ट्रेलिया में होने वाले वर्ल्ड ड्वार्फ गेम्स पर है। इसके लिए वे गांव में रोजाना दौड़ और शॉटपुट की कड़ी प्रैक्टिस कर रहे हैं।
छुट्टियों की चुनौती
संतोष बताते हैं कि प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए उन्हें छुट्टियां लेने में बहुत मुश्किल होती है। अक्सर उन्हें जिला मुख्यालय से लेकर पटना तक चक्कर लगाने पड़ते हैं। वे चाहते हैं कि शिक्षा विभाग खेल विभाग से समन्वय करे और खिलाड़ियों को अलग से छुट्टी देने की व्यवस्था बने, ताकि वे प्रतियोगिताओं की बेहतर तैयारी कर सकें।
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संतोष जैसे खिलाड़ी देश के अनमोल रत्न
गया के सहायक निदेशक (दिव्यांगजन सशक्तिकरण) अविनाश कुमार कहते हैं—“संतोष जैसे खिलाड़ी देश के अनमोल रत्न हैं। उन्हें समाज की परवाह किए बिना आगे बढ़ते रहना चाहिए। वे एक अच्छे खिलाड़ी होने के साथ-साथ बेहतरीन शिक्षक भी हैं।”
परिवार का गर्व
संतोष के पिता अशोक कुमार सिंह कहते हैं-
“बचपन में संतोष की लंबाई नहीं बढ़ रही थी, तो हम चिंतित थे। गरीबी के बावजूद इलाज के लिए खूब प्रयास किया, लेकिन किस्मत में कुछ और लिखा था। आज संतोष ने यह साबित कर दिया है कि सफलता का कद सबसे बड़ा होता है।”
नए खिलाड़ियों को तैयार कर रहे
संतोष कहते हैं कि उन्हें शुरुआती दिनों में किसी ने मदद नहीं की, सबकुछ उन्होंने खुद सीखा। यही वजह है कि अब वे अपने स्कूल के बच्चों को प्रशिक्षण देते हैं। उनके मार्गदर्शन में कई खिलाड़ी राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक खेल चुके हैं।



