डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ कृत ‘पुन्यपथी’ महाकाव्य केवल त्रेतायुगीन श्रवण कुमार की कथा का पुनर्कथन नहीं है, बल्कि यह गिरते हुए सामाजिक मूल्यों, क्षीण होती पारिवारिक संवेदनाओं और विस्मृत होती सेवा-परम्परा के विरुद्ध एक सशक्त साहित्यिक उद्घोष है। इस कृति को पढ़ते हुए पाठक अतीत के आदर्शों से संवाद करता हुआ वर्तमान की विडंबनाओं से टकराता है।
महाकाव्य परम्परा और शास्त्रीय कसौटी
भारतीय काव्यशास्त्र में आचार्य भामह और दण्डी ने “सर्गबन्धो महाकाव्यम्” कहकर महाकाव्य की संरचना को परिभाषित किया है। ‘पुन्यपथी’ इन शास्त्रीय मानकों पर पूर्णतः खरी उतरती है—
- सर्गबद्धता : यह महाकाव्य आठ सर्गों तथा एक ‘सर्ग-चिंतन’ में विभक्त है।
- नायक का उदात्त चरित्र : श्रवण कुमार का चरित्र ‘धीरोदात्त’ नायक का आदर्श रूप है, जो त्याग, सेवा और कर्तव्यबोध की प्रतिमूर्ति है।
- रस योजना : काव्य में करुण रस की प्रधानता है, जो अंततः शान्त रस में पर्यवसित होती है।
विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में ‘पुन्यपथी’
अरस्तू ने एपिक के लिए जिस ‘भव्यता’ (Grandeur) की अपेक्षा की है, वह श्रवण के नैतिक संकल्पों और आत्मिक दृढ़ता में स्पष्ट दिखाई देती है। जहाँ पश्चिमी महाकाव्य—जैसे इलियड और ओडिसी—युद्ध और शौर्य को केंद्र में रखते हैं, वहीं भारतीय महाकाव्य ‘धर्म’ और ‘नैतिकता’ को जीवन का आधार मानते हैं।
विद्वान ए.बी. कीथ के शब्दों में, “भारतीय महाकाव्य केवल इतिहास नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला का मार्गदर्शन है।”
इस दृष्टि से ‘पुन्यपथी’ भारतीय महाकाव्य परम्परा की जीवंत कड़ी है।
दार्शनिक केंद्र : प्रारब्ध और स्वीकार
महाकाव्य का दार्शनिक केंद्र ‘प्रारब्ध’ है। द्वितीय सर्ग में ब्रह्मा द्वारा शांतवन को पुत्र-प्राप्ति का वरदान और साथ ही अंधत्व का शाप—जीवन के द्वंद्व को उद्घाटित करता है—
“पुत्र रत्न पाते ही दोनों अंधे हो जाओगे
क्या ऐसी वेदना सहन की है तुझको तैयारी।”
यह प्रसंग उपनिषदों के उस दर्शन को पुष्ट करता है जहाँ सुख और दुख एक-दूसरे के पूरक हैं। शांतवन का उत्तर—
“पुत्र-नयन से ही अब देखेंगे संसार”—दार्शनिक परिपक्वता और जीवन-सत्य की स्वीकृति का प्रतीक है।
श्रवण : व्यक्ति नहीं, संस्कार
डॉ. मस्ताना की लेखनी की विशेषता है—सरलता में गंभीरता। उन्होंने श्रवण को मात्र एक पुत्र नहीं, बल्कि एक संस्कार के रूप में प्रस्तुत किया है—
“श्रवण, मात्र एक नाम नहीं वह संस्कार का स्थापक
महामानवों की पंक्ति में, सुकृतियाँ उसकी व्यापक।”
समकालीन समाज पर प्रहार
‘सर्ग-चिंतन’ में कवि आधुनिक समाज की विडंबनाओं पर तीखा प्रहार करते हैं—
“बेटों के ठाट-बाट छूते हैं अम्बर को
वृद्धों के जीवन की साँझा संताप है…
वृद्धों को आश्रम में जीना बचा है बस।”
ये पंक्तियाँ ‘पुन्यपथी’ को केवल पौराणिक आख्यान नहीं रहने देतीं, बल्कि उसे समकालीन सामाजिक दस्तावेज बना देती हैं।
नारी चरित्र : विद्या का नवोन्मेषी चित्रण
महाकाव्य का सबसे क्रांतिकारी पक्ष श्रवण की पत्नी ‘विद्या’ का चरित्र है। परम्परागत कथाओं में अनुपस्थित यह पात्र यहाँ नारी-त्याग और सहधर्मिणी भाव का प्रतीक बनकर उभरता है।
“जहाँ कहीं भी रहूँ, रहूँ मैं, पति चरणों की दासी।”
यहाँ ‘दासी’ शब्द दासता का नहीं, बल्कि अद्वैत, प्रेम और समर्पण का द्योतक है। कवि स्पष्ट करते हैं कि विद्या के बिना श्रवण की तीर्थयात्रा और साधना अधूरी होती।
तीर्थाटन : सांस्कृतिक भूगोल की रचना
छठे सर्ग में तीर्थों का वर्णन केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अखंडता का काव्यात्मक चित्र है—प्रयाग, काशी, केदारनाथ और बद्रीनाथ ‘पुण्य’ के सूत्र में बंधते हैं।
त्रासदी और मृत्यु-दर्शन
आठवें सर्ग में महाकाव्य त्रासदी के शिखर पर पहुँचता है—
“जो है जन्मा, मृत्यु उसकी है सुनिश्चित
जानते जो सत्य, उनको हर्ष है।”
दशरथ का शब्दभेदी बाण और श्रवण का अंतिम पुकार—“हाय माँ!”—ममता, कर्तव्य और नियति की त्रिवेणी है।
निष्कर्ष : ‘पुन्यपथी’ का शाश्वत संदेश
‘पुन्यपथी’ केवल अतीत का गान नहीं, बल्कि भविष्य के लिए नैतिक नींव है। यह सिखाता है कि—
- सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।
- कुल से बड़ा कर्म होता है।
- संबंध वासना नहीं, कर्तव्य पर आधारित होने चाहिए।
डॉ. गोरख प्रसाद ‘मस्ताना’ ने अपनी सर्जनात्मक शक्ति से ऐसे चरित्र को पुनर्जीवित किया है जिसकी आज समाज को सर्वाधिक आवश्यकता है। ‘पुन्यपथी’ का पथिक वह प्रत्येक व्यक्ति है जो अपने माता-पिता की आँखों की ज्योति बनना चाहता है।



