नई दिल्ली: भारत में कुल बिजली उत्पादन में तीन फीसदी परमाणु ऊर्जा (Nuclear Power) का योगदान है। 2024-25 में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों (Nuclear Power plants) से 56 हजार 681 मिलियन यूनिट (एमयू) बिजली का प्रोडक्शन किया गया। इससे पर्यावरण में लगभग 49 मिलियन टन CO2(e) उत्सर्जन को बचाया। वर्ष 2024-25 के दौरान परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से बिजली का औसत शुल्क ₹3.83 प्रति यूनिट था।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 2025-26 के बजट में 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया था। अमेरिका, फ्रांस, चीन, रूस, दक्षिण कोरिया, कनाडा, यूक्रेन और जापान समेत दुनिया के कई देश इस पर काम कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने शुक्रवार को लोकसभा में बताया कि सरकार ने न्यूक्लियर पावर में सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर भागीदारी के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं शुरू की हैं।
सरकार ने एसएमआर और नई उन्नत प्रौद्योगिकियों में रिसर्च और डिवेलपमेंट को सक्षम करने के उपायों की भी घोषणा की है। एडवांस्ड टेक्नोलॉजी पर आधारित और वर्तमान रिएक्टरों को तैनात करके लक्ष्य हासिल करने की योजना है। परमाणु ऊर्जा क्षमता में 24 रिएक्टर हैं। इनकी क्षमता 8780 मेगावाट (विस्तारित शटडाउन के तहत आरएपीएस-1 (100 मेगावाट) को छोड़कर) है। 2031-32 तक इंस्टॉल्ड न्यूक्लियर पावर कैपिसिटी 22380 मेगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है।
कृषि और रक्षा से लेकर स्वास्थ्य सेवा तक में Nuclear Power की शक्ति
परमाणु कृषि
रेडिएशन से प्रेरित उत्परिवर्तन और क्रॉस ब्रीडिंग ने चावल, दालों, तिलहन, जूट, ज्वार, गेहूं आदि सहित 71 नई फसल किस्मों का विकास व्यावसायिक खेती के लिए किया है। परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) की एक घटक इकाई, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) के विकसित इन किस्मों में उच्च उपज, शीघ्र परिपक्वता, जैविक और अजैविक तनाव-सहिष्णुता, जलवायु लचीलापन जैसे गुण हैं। डीएई की एक औद्योगिक इकाई, विकिरण एवं आइसोटोप प्रौद्योगिकी बोर्ड (ब्रिट) खाद्य और कृषि उत्पादों के रेडिएशन प्रसंस्करण के लिए Co-60 आधारित सीलबंद रेडिएशन स्रोतों का उत्पादन और आपूर्ति करता है।
खाद्य संरक्षण
रेडिएशन प्रसंस्करण का उपयोग कृषि उत्पादों, मछली और मसालों के शेल्फ-लाइफ को बढ़ाने के लिए प्रभावी ढंग से किया गया है। आमों की शेल्फ-लाइफ को 35 दिनों तक बढ़ाने से समुद्री मार्ग से आमों के लागत प्रभावी निर्यात में मदद मिली है। प्याज और आलू की शेल्फ-लाइफ को क्रमशः 7.5 महीने और 8 महीने तक बढ़ाने से खराब होने में कमी आती है और यह किसानों के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद है।
रक्षा एवं सुरक्षा
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) ने भाभा कवच नाम से हल्की और लागत प्रभावी बुलेट-प्रूफ जैकेट की एक स्पिन-ऑफ तकनीक स्वदेशी रूप से विकसित की है। यह जैकेट थ्रेट लेवल III+ [भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) लेवल 5 सुरक्षा] के लिए योग्य है। अब इसका उपयोग सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी), और भारतीय सेना द्वारा किया जा रहा है।
इस तकनीक को व्यावसायीकरण के लिए भारतीय कंपनियों को सफलतापूर्वक हस्तांतरित कर दिया गया है। स्वदेशी कार्गो कंटेनर स्कैनर प्रणाली को सफलतापूर्वक डिजाइन, विकसित और प्रदर्शित किया गया है। यह आयात का विकल्प बनने वाली तकनीक फील्ड ट्रायल और उसके बाद के तैनाती के लिए उपलब्ध है।
स्वास्थ्य सेवा
बार्क में हेल्थ सर्विस के लिए रेडियो आइसोटोप अनुसंधान रिएक्टरों या खर्च किए गए परमाणु ईंधन के प्रसंस्करण से उपयोगी आइसोटोप के पृथक्करण के माध्यम से उत्पन्न होते हैं। बार्क ने आंख के कैंसर के इलाज के लिए स्वदेशी रूप से आयात के विकल्प के तौर पर और लागत प्रभावी रूथेनियम-106 (Ru-106) आई प्लेक्स विकसित किए हैं।
रेडियो-आइसोटोप उत्पादन
स्ट्रोटियम-89 (Sr-89) का स्वदेशी उत्पादन एक महत्वपूर्ण सामाजिक आवश्यकता और एक मूल्यवान आयात का विकल्प है; यह 50.5 दिनों के आधे जीवन के साथ एक शुद्ध बीटा उत्सर्जक है और इसका उपयोग हड्डी के मेटास्टेटिक कैंसर की विशेष चिकित्सा देखभाल के लिए किया जाता है।
किरणन के लिए लिनैक
आरआरसीएटी ने चिकित्सा उपकरणों के टर्मिनल स्टेरलाइजेशन के लिए स्वदेशी रूप से 10 मेगाइलेक्ट्रान वोल्ट औद्योगिक इलेक्ट्रॉन लिनैक, प्रक्रिया प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉन बीम रेडिएशन प्रसंस्करण सुविधा विकसित की है। देश में अपनी तरह की पहली सुविधा, यह इंदौर में परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी) और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) लाइसेंस के साथ व्यावसायिक मोड में काम कर रही है और विनियमित चिकित्सा उपकरणों के टर्मिनल स्टेरलाइजेशन के लिए नियमित रूप से इलेक्ट्रॉन बीम प्रसंस्करण सेवाएं प्रदान कर रही है।
वॉटर ट्रीटमेंट
रेडिएशन-ग्राफ्टेड सूती कपड़े पर आधारित नई तकनीक विकसित की गई है, जिसका उपयोग कपड़ा/रंग उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट जल से रंग निकालने के लिए प्रभावी ढंग से किया जाता है। उपचारित पानी को औद्योगिक उद्देश्यों के लिए फिर से उपयोग किया जा सकता है। यह नवाचार पर्यावरण संरक्षण के लिए एक कम लागत वाला, कुशल समाधान प्रदान करता है। इस तकनीक को व्यावसायीकरण के लिए एक निजी उद्यमी को हस्तांतरित कर दिया गया है।
क्या न्यूक्लियर वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम
न्यूक्लियर पावर प्लांट (NPP) में वेस्ट काफी कम होते हैं जिसे अच्छे तरीके से ट्रीट करने के साथ-साथ इकट्ठा किया जाता है ताकि इसका आकार कम हो। कंसंट्रेटों को सीमेंट, बिटुमेन, पॉलिमर आदि जैसे पदार्थों में स्थिर किया जाता है और निगरानी में कार्यस्थल पर स्थित विशेष रूप से निर्मित संरचनाओं (सतह निपटान सुविधाओं के पास) में संग्रहित किया जाता है।
उपचारित द्रवों और गैसों को डाल्यूट किया जाता है और यह सुनिश्चित करते हुए कि उत्सर्जन परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी) द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर हो, निरंतर निगरानी में उत्सर्जित किया जाता है। संग्रहित अपशिष्टों का रेडियोधर्मिता स्तर समय के साथ कम होता जाता है और संयंत्र के जीवन के अंत तक बहुत कम स्तर तक रह जाता है। उत्सर्जन की निगरानी भी एईआरबी द्वारा की जाती है।
पिछले 10 वर्षों के दौरान, प्रचालनगत परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से प्रतिवर्ष उत्पन्न होने वाले निम्न और मध्यम स्तर के अपशिष्ट की मात्रा क्रमशः लगभग 1.25 लाख घन मीटर (एम3) और 130 घन मीटर (एम3) रही है। भविष्य में अपशिष्ट उत्पादन का अनुमान वास्तविक क्षमता वृद्धि और अपनाई गई प्रौद्योगिकियों पर निर्भर करेगा।



