Nuclear Energy Mission से मिलेगा जीरो कार्बन उत्सर्जन का मुकाम

भारत जीरो कार्बन एमिशन का लक्ष्य हासिल करने के लिए गंभीर कदम उठा रहा है। परमाणु ऊर्जा इसमें बड़ी भागीदार है। मिशन मोड में इसका काम भी चल रहा है।

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नई दिल्ली: जीरो कार्बन एमिशन (शून्य कार्बन उत्सर्जन) की राह पर निकलने भारत ने अहम पड़ाव हासिल किया है। देश में परमाणु उर्जा मिशन (Nuclear Energy Mission) का ऐलान किया गया है। इससे कम से कम कार्बन उत्सर्जन के साथ परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन बढ़ेगा। बेस लोड आवश्यकता भी पूरी होगी को पूरा करना है, जो इस समय जीवाश्म ईंधन वाले बिजली प्लांटों से है। 

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि सरकार ने 2047 तक 100 गीगावॉट की परमाणु ऊर्जा क्षमता और 2070 तक नेट ज़ीरो के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में यह कदम उठाया है। 

क्या है मिशन का लक्ष्य

परमाणु ऊर्जा मिशन में ग्रीन फील्ड्स, ब्राउन फील्ड्स, कैप्टिव प्लांट के रूप में और दूर-दराज के क्षेत्रों में ऑफ-ग्रिड अनुप्रयोगों के लिए बड़े व छोटे परमाणु ऊर्जा प्लांट लगाए जाएंगे। इससे निजी क्षेत्र के साथ सक्रिय भागीदारी, लघु मॉड्यूलर रिएक्टरों (एसएमआर) का अनुसंधान एवं विकास और उन्नत तकनीकों के लिए सक्षम उपाय होगा। बीएआरसी एसएमआर (R&D of Small Modular  Reactors)  का स्वदेशी से डिजाइन और विकास कर रहा है। 

तीन रिएक्टर

  • 200 मेगावाट भारत लघु मॉड्यूलर रिएक्टर
  • 55 मेगावाट लघु मॉड्यूलर रिएक्टर
  • हाइड्रोजन उत्पादन के लिए उपयुक्त थर्मोकेमिकल प्रक्रिया के साथ युग्मन द्वारा हाइड्रोजन उत्पादन के लिए 5 मेगावाट उच्च तापमान गैस कूल्ड रिएक्टर

60-72 महीने होंगे पूरे

इन रिएक्टरों के निर्माण की मंजूरी मिल चुकी है। परियोजनाओं की प्रशासनिक स्वीकृति के बाद रिएक्टरों का निर्माण 60 से 72 महीनों में पूरा होने की संभावना है। एनपीसीआईएल के सहयोग से परमाणु ऊर्जा विभाग के स्थलों पर बीएसएमआर और एसएमआर की प्रमुख इकाइयां स्थापित करने की योजना है।

इन प्लांट को कैप्टिव पावर प्लांट के रूप में तैनाती, बंद हो रहे जीवाश्म ईंधन वाले प्लांट के पुनरुद्देश्यीकरण तथा हाइड्रोजन उत्पादन के लिए डिजाइन और विकसित किया गया है, ताकि औद्योगिक और परिवहन क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा के प्रवेश को बढ़ाकर डीकार्बोनाइजेशन के मुख्य उद्देश्य के साथ परिवहन क्षेत्र को बूस्ट किया जा सके।

देश में है 24 रिएक्टर

फिलहाल देश में परमाणु ऊर्जा क्षमता में 24 रिएक्टर शामिल हैं जिनकी कुल क्षमता 8780 मेगावॉट है। इसमें आरएपीएस-1 (100 मेगावॉट) शामिल नहीं है जो लंबे समय से बंद है। केएपीएस-3 एवं 4 (2×700 मेगावाट) और आरएपीपी-7 (700 मेगावाट) वाणिज्यिक परिचालन में हैं।13600 मेगावॉट क्षमता वाले 18 रिएक्टर कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। इनके क्रमिक रूप से पूर्ण होने पर, स्थापित परमाणु ऊर्जा क्षमता वर्तमान 8780 मेगावॉट से बढ़कर 22380 मेगावॉट हो जाएगी। 100 गीगावॉट का लक्ष्य मौजूदा और विकासशील नई उन्नत तकनीकों पर आधारित रिएक्टरों की स्थापना करके प्राप्त करने की योजना है।

चालू न्यूक्लियर एनर्जी प्लांट

जगहप्रोजेक्टक्षमता (मेगावॉट)
रावतभाटा, राजस्थानआरएपीपी-81X 700
कुडनकुलम, तमिलनाडु केकेएनपीपी-3&42 x 1000
हरियाणा(गोरखपुर)जीएचएवीपी-1 और 22 x 700
(कलपक्कम)पीएफबीआर 1 x 500

पूर्व-परियोजना गतिविधियों के अंतर्गत परियोजनाएं

कैगा, कर्नाटककैगा-5 और 62 x 700
गोरखपुर, हरियाणा जीएचएवीपी– 3&42 x 700
चुटका, मध्य प्रदेशचुटका-1 और 22 x 700
माही-बांसवाड़ा, राजस्थान माही बांसवाड़ा-1&2*2 x 700
माही बांसवाड़ा-3&4*2 x 700

महाराष्ट्र के तारापुर में चार रिएक्टर हैं: यूनिट-1 और 2 (2 x 160 मेगावाट) और यूनिट-3 और 4 (2 x 540 मेगावाट)। वर्तमान में, यूनिट-3 और 4 कार्यरत हैं, जबकि यूनिट-1 और 2 (2 x 160 मेगावाट) का नवीनीकरण और उन्नयन कार्य चल रहा है। इन गतिविधियों के पूरा होने पर, यूनिट-1 और 2 को नियामक मंज़ूरी के अनुसार पुनः चालू किया जाएगा।

हेल्थकेयर, एग्रीकल्चर और रिसर्च में बीआरआईटी का अहम योगदान

मंत्री ने बताया कि परमाणु ऊर्जा विभाग की इकाई बोर्ड ऑफ रेडिएशन एंड आइसोटॉप टेक्नॉलजी (बीआरआईटी) स्वास्थ्य सेवा, कृषि, अनुसंधान और उद्योग में एप्लिकेशन के लिए रेडिएशन और आइसोटॉप पर आधारित उत्पाद और सेवाएं मुहैया कराती है। अनुदान पाने वाले संस्थान, टाटा मेमोरियल सेंटर (टीएमसी) ने पहले ही टियर-2 और टियर-3 शहरों में किफायती परमाणु चिकित्सा अवसंरचना का विस्तार किया है। ऐसे टियर-2 शहरों के नाम हैं: न्यू चंडीगढ़, विशाखापत्तनम, भुवनेश्वर, गुवाहाटी, वाराणसी, मुजफ्फरपुर (बिहार) और टियर-3 शहर है संगरूर (पंजाब)। परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के अंतर्गत अनुसंधान एवं विकास इकाई, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र ने पीपीपी-आधारित आइसोटोप रिएक्टर परियोजना के लिए सैद्धांतिक स्वीकृति प्राप्त कर ली है और परियोजना की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) की समीक्षा की जा रही है।

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