नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के सरकारी मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (आईएचबीएएस) में सुविधाओं की कमी के चलते एक नवजात शिशु की मौत के मामले ने बड़ा तूल पकड़ लिया है। इस घटना पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया है और दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक बेसहारा महिला को अदालत के आदेश के बाद 7 सितंबर 2025 को आईएचबीएएस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बताया जा रहा है कि महिला गर्भवती थी और उसे विशेष देखभाल की आवश्यकता थी। लेकिन अस्पताल में प्रसव के लिए बुनियादी सुविधाओं की अनुपलब्धता के बावजूद उसे वहीं रखा गया। स्थिति तब बिगड़ी जब 9 सितंबर की रात महिला ने अस्पताल के शौचालय में बच्चे को जन्म दिया।
आरोप है कि अस्पताल कर्मचारियों को गर्भनाल काटने के लिए क्लैंप लगाने में भी काफी समय लगा। प्राथमिक इलाज में देरी और संसाधनों की भारी कमी के कारण नवजात की हालत बिगड़ती गई। बाद में महिला और बच्चे को एम्बुलेंस से समीपवर्ती स्वामी दयानंद अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर नवजात की जान नहीं बचा सके।
मानवाधिकार आयोग की सख्ती
एनएचआरसी ने मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से कहा है कि यदि ये तथ्य सही हैं तो यह घटना मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन की ओर इशारा करती है। आयोग ने दिल्ली सरकार से पूछा है कि आखिरकार ऐसे हालात में गर्भवती महिला को आईएचबीएएस जैसे अस्पताल में क्यों भर्ती किया गया, जहां प्रसव सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं हैं।
आयोग ने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के चलते किसी भी नागरिक के जीवन से खिलवाड़ अस्वीकार्य है और यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह मरीजों को न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराए।
एनएचआरसी ने सरकार से मांगा जवाब
आयोग ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट सौंपने को कहा है। इस रिपोर्ट में घटना की सच्चाई, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका, महिला की वर्तमान स्थिति और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देना होगा।
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सवालों के घेरे में अस्पताल प्रशासन
इस घटना से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दरअसल, आईएचबीएएस मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां प्रसव संबंधी सुविधाओं का न होना प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भवती महिला को ऐसे संस्थान में भर्ती करना जहां आपातकालीन प्रसव की सुविधा उपलब्ध नहीं है, न केवल गैर-जिम्मेदाराना है बल्कि सीधे-सीधे मरीज और शिशु के जीवन से खिलवाड़ है।
महिला का उपचार जारी
जानकारी के मुताबिक, महिला को अब दूसरे सरकारी अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया है, जहां उसका इलाज चल रहा है। वहीं, बच्चे की मौत के बाद क्षेत्रीय स्तर पर सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कड़ी नाराजगी जताई है।



