नई दिल्ली: निर्मोही अखाड़ा, अखाड़ा परिषद और अखिल भारतीय संत समिति ने आज दिल्ली में “धार्मिक स्वतंत्रता एवं धर्मांतरण” विषय पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस कॉन्फ्रेंस में देशभर के संत समाज ने न केवल धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के समर्थन में पूरी तरह से एकजुटता दिखाई, बल्कि इस संबंध में एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने का भी ऐलान किया।
विविधिता में भारत की महानता
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए निर्मोही अखाड़ा के अध्यक्ष एवं अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत राजेंद्र दास जी महाराज और अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि भारत की महानता इसकी विविधता में निहित है। हजारों वर्षों से यहाँ विभिन्न धर्म, परंपराएँ और संप्रदाय फलते-फूलते रहे हैं। इस विविधता का आधार धार्मिक स्वतंत्रता है। हालाँकि, आज यह स्वतंत्रता धर्मांतरण के रूप में एक गंभीर खतरे का सामना कर रही है।
एक केंद्रीय कानून की मांग
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। न्यायपालिका ने कई मामलों में यह निर्णय दिया है कि धर्म प्रचार करना धर्मांतरण नहीं माना जाएगा। स्वतंत्रता के बाद, देश के कई संतों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए एक केंद्रीय कानून की मांग की।
संविधान सभा में भी इस विषय पर चर्चा हुई किंतु, तत्कालीन सत्ताधारी दल का यह मानना था कि इस कानून को बनाने का अधिकार सिर्फ राज्य सरकारों को है। इसीलिए, भारत के कई राज्यों – मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, ओडिशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि ने धर्म स्वतंत्रता अधिनियम बनाए। इन कानूनों का उद्देश्य आस्था का दमन करना नहीं, बल्कि छल-कपट, बल प्रयोग और प्रलोभन के माध्यम से धर्म परिवर्तन को रोकना है।
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विचार करें सर्वोच्च न्यायालय
अब अवैध धर्मांतरण करने वाली शक्तियों व उनके समर्थकों ने इन संविधान सम्मत कानूनों को संबंधित उच्च न्यायालयों में चुनौती दी है किन्तु दुर्भाग्य से सर्वोच्च न्यायालय ने इन सबको इकट्ठा कर एक साथ सुनवाई का आदेश दिया है। संतों का मानना है कि राज्य सरकारों का विषय होने के कारण, उच्च न्यायालयों द्वारा निर्णय के पश्चात ही, इन मामलों में सर्वोच्च न्यायालय को विचार करना चाहिए। वैसे भी हर राज्य की परिस्थितियां अलग अलग हैं, वहाँ के कानूनों का स्वरूप और उनका विरोध करने के आधार भी अलग अलग हैं।
इन पर निशाना
उन्होंने कहा कि राज्यों द्वारा पारित धर्म स्वतंत्रता अधिनियमों के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने उन राज्यों से भी राय मांगी है जहां ऐसा कोई कानून बना ही नहीं है और वहाँ के सत्ताधारी दल स्वयं धर्मांतरण के कुचक्र रचने वाली शक्तियों के साथ खड़े हैं। उन सब को भी एक साथ सुनना देश के चिंतकों के मन में शंका निर्माण करता है। इसी समय इन शक्तियों के साथ जुड़े कुछ कथित संविधानवेत्ता धर्मांतरण के संबंध में संविधान पीठ द्वारा स्थापित निर्णयों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए दिखे।
अंतर्राष्ट्रीय षडयन्त्र
धर्मांतरण के पक्ष में अंतर्राष्ट्रीय षडयन्त्र पहले से ही सक्रिय हैं, जो अनेक बार उजागर हो चुके हैं। यह आशंका निर्मूल नहीं है कि हमारी न्यायपालिका भी कहीं इन षड्यंत्रों से प्रभावित तो नहीं हो रही! हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हमारी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा सुरक्षित रहे। संतों ने यह भी कहा कि आज की परिस्थियों की भीषणता को देखते हुए आवश्यक है कि अवैध धर्मांतरण को रोकने वाले कानूनों को और अधिक मजबूत किया जाए ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव व स्वधर्म पालन की स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके। प्रेस वार्ता में विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ सुरेंद्र जैन व अखाड़ा परिषद के प्रवक्ता पूज्य श्रीमहंत गौरी शंकर दास जी महाराज भी उपस्थित थे।



