नई दिल्ली: दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास बसा मेहरम नगर, लगभग तीन सौ साल पुराना गांव, आज एक अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) ने हाल ही में इस गांव की जमीन पर दावा करते हुए निवासियों को खाली करने का नोटिस जारी किया है। इस नोटिस ने ग्रामीणों में आक्रोश और भय की लहर पैदा कर दी है। विरोध में, ग्रामीणों ने एकजुट होकर दो दिवसीय महापंचायत शुरू की, जिसमें वे अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह सवाल अब सबके मन में है कि क्या एनएसजी या कोई अन्य सरकारी एजेंसी किसी भी जमीन पर इस तरह दावा कर सकती है?
क्या है NSG का अधिकार?
एनएसजी, जो 1984 में आतंकवाद से निपटने और वीवीआईपी सुरक्षा के लिए गठित की गई थी, का मुख्य उद्देश्य सुरक्षा कार्यों तक सीमित है। यह अपने आप में किसी भी जमीन पर दावा नहीं कर सकती। हालांकि, अगर केंद्र सरकार या रक्षा मंत्रालय किसी क्षेत्र को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक घोषित करता है, तो एनएसजी उस जमीन का उपयोग कर सकती है। लेकिन यह प्रक्रिया भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के तहत ही संभव है, जिसमें मुआवजे और कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। बिना वैध प्रक्रिया के कोई भी एजेंसी निजी या सामुदायिक जमीन पर कब्जा नहीं कर सकती।
मेहरम नगर विवाद की जड़
मेहरम नगर का मामला जटिल है। सूत्रों के अनुसार, इस गांव का एक हिस्सा पहले से ही रक्षा मंत्रालय या वायुसेना के लिए चिन्हित था। एनएसजी का दावा इसी आधार पर हो सकता है। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यह उनकी पुश्तैनी जमीन है और बिना उचित मुआवजे या कानूनी प्रक्रिया के उन्हें बेदखल करना अन्याय है। सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि बिना वैध अधिग्रहण के कोई भी सरकारी दावा अवैध है। अगर जमीन सरकारी रिकॉर्ड में रक्षा भूमि के रूप में दर्ज है, तो ग्रामीणों का मालिकाना हक कमजोर हो सकता है।
ग्रामीणों का संघर्ष और भविष्य
मेहरम नगर के निवासियों ने महापंचायत के जरिए अपनी आवाज बुलंद की है। उनका कहना है कि यह सिर्फ जमीन का सवाल नहीं, बल्कि उनकी पहचान और इतिहास का मामला है। इस विवाद ने एक बार फिर भूमि अधिग्रहण और सरकारी नीतियों पर सवाल उठाए हैं। क्या सरकार ग्रामीणों को उचित मुआवजा और पुनर्वास देगी, या यह मामला लंबे कानूनी जंग में उलझ जाएगा? यह देखना बाकी है।



