नई दिल्ली: पाकिस्तान (Pakistan) ने अफगान शरणार्थियों को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए खैबर पख्तूनख्वा (Khyber Pakhtunkhwa) प्रांत में पांच प्रमुख शिविरों को बंद करने का आदेश दिया है। यह फैसला उस समय आया है जब सरकार ने देश में बढ़ते अपराध और आतंकवाद के लिए लंबे समय से बसे अफगान शरणार्थियों (Afghan Refugees) को जिम्मेदार ठहराया है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान ने पिछले वर्ष अक्टूबर से बिना दस्तावेज वाले अफगानों को वापस भेजने की प्रक्रिया तेज कर दी थी।
चार दशकों का अंत
पाकिस्तान में अफगान शरणार्थियों का बसेरा 40 साल से अधिक समय तक रहा। सोवियत संघ के आक्रमण के बाद लाखों अफगान नागरिक पाकिस्तान में शरण लेने पहुंचे थे। लेकिन अब सरकार ने साफ कर दिया है कि देश में रहने वाले शरणार्थियों के खिलाफ कार्रवाई और सख्त होगी। एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, बंद किए जा रहे शिविरों में हरिपुर जिले के तीन, चित्राल का एक और अपर दीर का एक शिविर शामिल है। अकेले हरिपुर के पनियन शिविर में ही एक लाख से अधिक अफगान शरणार्थी रहते थे।
सुरक्षा कारणों का हवाला
पाकिस्तान सरकार ने इस कदम के पीछे सुरक्षा चिंताओं को मुख्य वजह बताया है। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में दोहराया कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में आतंकवाद की जड़ें अफगान शरणार्थियों से जुड़ी हुई हैं। उनका कहना है कि बिना दस्तावेज रह रहे शरणार्थी न केवल कानून व्यवस्था के लिए चुनौती हैं बल्कि आतंकी नेटवर्क को भी पनाह देते हैं।
कानूनी अड़चनें
हालांकि, इस सख्त कार्रवाई के बीच कुछ मामलों में अदालतों ने राहत भी दी है। प्रेट्र की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के एक हाई कोर्ट ने उन 40 अफगान नागरिकों के निर्वासन पर रोक लगा दी है जिन्होंने पाकिस्तानी महिलाओं से विवाह किया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि जब तक शीर्ष पंजीकरण निकाय उनके नागरिकता आवेदन पर निर्णय नहीं ले लेता, तब तक उन्हें वापस नहीं भेजा जाएगा।
मानवीय संकट की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर शरणार्थियों की वापसी से मानवीय संकट गहराने का खतरा है। अफगानिस्तान पहले ही राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट से जूझ रहा है। लाखों लोगों की वापसी वहां संसाधनों पर और अधिक दबाव डालेगी। अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इस मसले पर अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं।
पाकिस्तान सरकार का यह कदम देश की सुरक्षा नीतियों में बदलाव का संकेत देता है। जहां एक ओर यह फैसला पाकिस्तान की घरेलू चुनौतियों को कम करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह अफगान शरणार्थियों और उनके परिवारों के लिए गहरी चिंता का विषय है। चार दशक से अधिक समय तक चले इस अध्याय का समापन अब कई सवाल खड़े कर रहा है कि क्या यह समाधान है या किसी नए संकट की शुरुआत।



