नई दिल्ली: भारत में चिकित्सा का इतिहास चरक और सुश्रुत के समय से शुरू होता है, जब आयुर्वेद और यूनानी जैसी पद्धतियां स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ थीं। लेकिन 18वीं सदी में ब्रिटिश शासन के साथ पश्चिमी चिकित्सा ने भारत में कदम रखा। ब्रिटिश शासकों को स्थानीय चिकित्सा पर भरोसा नहीं था, इसलिए उन्होंने यूरोप से सर्जनों को बुलाया। युद्धों के दौरान ये सर्जन सैनिकों का इलाज करते थे, लेकिन भारतीय सैनिकों में यूरोपीय दवाओं के प्रति हिचक थी। धार्मिक मान्यताएं और अविश्वास इसके पीछे बड़े कारण थे। फिर भी, पश्चिमी चिकित्सा धीरे-धीरे लोकप्रिय हुई और इसने भारत में मेडिकल शिक्षा की नींव रखी।
पहला MBBS बैच और मेडिकल बोर्ड की स्थापना
साल 1822 में ब्रिटिश मेडिकल बोर्ड ने भारत सरकार को पत्र लिखकर भारतीयों के लिए व्यवस्थित चिकित्सा शिक्षा शुरू करने का सुझाव दिया। इसका मकसद न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर करना था, बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए कुशल मेडिकल स्टाफ तैयार करना भी था। इस पहल के परिणामस्वरूप 1839 में भारत का पहला MBBS बैच पास हुआ, जो भारतीय चिकित्सा शिक्षा का एक ऐतिहासिक क्षण था। इस बैच ने न केवल स्थानीय स्तर पर डॉक्टरों की कमी को पूरा किया, बल्कि आधुनिक चिकित्सा को बढ़ावा देने में भी योगदान दिया।
कई भारतीय युवाओं ने इस दौरान विदेश जाकर चिकित्सा शिक्षा हासिल करने की हिम्मत दिखाई। चक्करबत्ती, भोला नाथ बोस, द्वारका नाथ बोस और गोपाल चंदर सील जैसे युवाओं ने सामाजिक बाधाओं को तोड़कर विदेश में पढ़ाई की और डॉक्टर बनकर लौटे। उस समय समुद्र पार करना और विदेश में पढ़ाई करना आसान नहीं था, फिर भी इन युवाओं ने अपने जुनून से भारतीय चिकित्सा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
इस दौर ने भारत में चिकित्सा शिक्षा को नया रूप दिया। यह समय पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा के बीच एक सेतु बन गया, जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए चिकित्सा के क्षेत्र में अनगिनत संभावनाएं खोलीं।



