नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र के दौरान पहला सप्ताह सियासी हंगामे में बीता। ऑपरेशन सिंदूर, बिहार में मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद अचानक उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे ने पहले सप्ताह की कार्यवाही को पटरी से उतार दिया। शुक्रवार को सरकार और विपक्ष के बीच सोमवार से सदन चलाने पर सहमति बनी। हालांकि यह सहमति जस्टिस वर्मा के खिलाफ सरकार की नई रणनीति से टूट सकती है।
दरअसल, सरकार की नई रणनीति जस्टिस वर्मा से जुड़ी महाभियोग प्रक्रिया को लोकसभा में नए सिरे से शुरू कराने की है। बीते सोमवार को राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ ने सदन में विपक्ष की ओर से इस संबंध में मिले नोटिस का उल्लेख कर सियासी भूचाल खड़ा कर दिया था। सरकार को बुरी तरह से असहज करने वाले इस कदम का हश्र धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे पर जा कर खत्म हुआ। ऐसे में सवाल है कि अगर सरकार ने इस मामले में लोकसभा में नए सिरे से प्रक्रिया शुरू की तो क्या उसे विपक्ष का सहयोग मिलेगा? क्या विपक्ष इसे राज्यसभा के अपमान से जोड़ कर सरकार को घेरने की कोशिश नहीं करेगा?
अब सरकार राज्यसभा की जगह लोकसभा में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का मन बना चुकी है। इस रणनीति के तहत लोकसभा स्पीकर ओम बिरला राज्यसभा की सहमति से अगले सप्ताह महाभियोग प्रक्रिया शुरू करने के लिए मिले नोटिस को स्वीकार कर इसके लिए आवश्ययक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन करेंगे। लोकसभा में नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करने को ले कर सरकार के अपने तर्क है। सरकारी सूत्र का कहना है कि इसके लिए राज्यसभा में नोटिस वापस लेने की प्रक्रिया पूरी करने की जरूरत नहीं है। वह इसलिए कि तत्कालीन सभापति ने सदन में प्रस्ताव का उल्लेख तो किया, मगर इसे एडमिट (स्वीकार) नहीं किया। ऐसे में जब इसे औपचारिक तौर पर न तो स्वीकार किया गया और न ही नोटिस एडमिट ही नहीं हुआ तो इसे लोकसभा में पेश करने के लिए उच्च सदन से वापस लेने की प्रक्रिया अपनाने की जरूरत नहीं है।
सामूहिक सहमति का भी उल्लंघन
उक्त सूत्र ने कहा कि राज्यसभा में अचानक महाभियोग से जुड़े नोटिस का सभापति द्वारा उल्लेख करना इस मामले में सरकार और विपक्ष के बीच बनी सामूहिक सहमति का भी उल्लंघन था। सामूहिक सहमति के तहत ही लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत विपक्ष के करीब-करीब सभी दलों और सत्ता पक्ष 152 सांसदों के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन लोकसभा स्पीकर को सौंपा गया था। राज्यसभा में जो ज्ञापन पेश किया गया उसमें सिर्फ विपक्ष के सांसदों के हस्ताक्षर थे। जबकि इस मामले को निपटाने में सरकार और विपक्ष के बीच सामूहिक सहमति बन गई थी, तब इसका राज्यसभा में उल्लेख किया जाना गैरजरूरी था।
आगे क्या है योजना?
सरकार की योजना इस प्रक्रिया को अगले सप्ताह शुरू करने की है। इस क्रम में लोकसभा अध्यक्ष महाभियोग प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए राज्यसभा की सहमति से तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन करेंगे। यह कमेटी संभवत: दो से तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देगी। ऐसे में अगर इस बीच जस्टिस वर्मा ने स्वयं पद नहीं छोड़ा तो संसद के शीतकालीन सत्र में महाभियोग प्रस्ताव ला कर उस पर चर्चा की जाएगी।
अब विपक्ष के रुख पर नजर
जस्टिस वर्मा से जुड़े मामले को राज्यसभा की जगह लोकसभा में प्रक्रिया शुरू करने की सरकार ने सार्वजनिक घोषणा नहीं की है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस आशय की घोषणा के बाद विपक्ष इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है। सरकार की योजना इस मामले में विपक्ष को विश्वास में लेने की है। चूंकि राज्यसभा में इससे संबंधित प्रस्ताव संयुक्त विपक्ष का है, ऐसे में उसकी ओर से इसे राज्यसभा की गरिमा कम करने का मुद्दा बनाया जा सकता है। हालांकि दूसरी ओर यह भी सच है कि लोकसभा में इस प्रस्ताव को शुरू करने पर नेता प्रतिपक्ष राहुल समेत विपक्ष के सभी बड़े नेताओं ने सहमति दी थी।



