नई दिल्ली: इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा Justice Yashwant Verma के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो गई है। सोमवार को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन लोकसभा और राज्यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव के लिए नोटिस सौंपे गए। यह स्वतंत्र भारत में किसी कार्यरत हाई कोर्ट जज के खिलाफ पहला महाभियोग प्रस्ताव है, जिसने न्यायिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
संसद में सांसदों का समर्थन
लोकसभा में 145 सांसदों ने जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन पर सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के प्रमुख नेताओं के हस्ताक्षर हैं, जिनमें कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, भाजपा के रविशंकर प्रसाद और अनुराग ठाकुर, एनसीपी-एसपी की सुप्रिया सुले, डीएमके के टीआर बालू, और कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल शामिल हैं। राज्यसभा में भी 63 सांसदों ने सभापति जगदीप धनखड़ को इसी तरह का नोटिस सौंपा, जिसमें आम आदमी पार्टी और इंडिया गठबंधन के अन्य दलों के सांसदों का समर्थन शामिल है। कांग्रेस सांसद सैयद नसीर हुसैन ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस भी इस मुद्दे पर सहमत है और जल्द ही अपने हस्ताक्षर देगी।
जस्टिस वर्मा पर आरोप
इस साल मार्च में जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने की घटना के दौरान उनके स्टोररूम से जली हुई नकदी की बोरियां बरामद हुई थीं। उस समय वे दिल्ली हाई कोर्ट में कार्यरत थे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक आंतरिक जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि इस स्टोररूम पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण था, जिसे गंभीर कदाचार माना गया। जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों का खंडन किया है और सुप्रीम कोर्ट में जांच समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी है, लेकिन संसद में सांसदों की एकजुटता ने उनके खिलाफ कार्रवाई को तेज कर दिया है।
महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया
भारतीय संविधान में ‘महाभियोग‘ शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन अनुच्छेद 124, 217, और 218 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया निर्धारित है। यह प्रक्रिया न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत संचालित होती है। इसके अनुसार:
- लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर वाले नोटिस की आवश्यकता होती है।
- यदि लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति नोटिस स्वीकार करते हैं, तो एक तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है, जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट जज, एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, और एक प्रख्यात विधिवेत्ता शामिल होते हैं।
- यह समिति तीन महीने के भीतर अपनी जांच पूरी कर संसद को रिपोर्ट सौंपती है।
- संसद में प्रस्ताव पर विचार-विमर्श और मतदान होता है, जिसमें प्रत्येक सदन में कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक होता है।
- यदि दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो यह अंतिम आदेश के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
- जस्टिस वर्मा के मामले में, दोनों सदनों में आवश्यक संख्या से अधिक सांसदों का समर्थन प्राप्त हो चुका है, जिसके बाद सभापति जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा के महासचिव को प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
एक अभूतपूर्व कदम
यह पहला अवसर है जब स्वतंत्र भारत में किसी हाई कोर्ट के कार्यरत जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई है। भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा, “न्यायपालिका की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता तभी बनी रहेगी, जब न्यायाधीशों का आचरण पारदर्शी और निष्पक्ष होगा। ये आरोप गंभीर हैं, और इसलिए महाभियोग प्रस्ताव आवश्यक हो गया।” कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने भी इस कदम का समर्थन करते हुए कहा कि यह न्यायपालिका में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
जस्टिस वर्मा की प्रतिक्रिया
जस्टिस यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर जांच समिति की रिपोर्ट को रद्द करने की मांग की है। उनका दावा है कि यह एक साजिश है और उनके पास नकदी का कोई संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जांच के दौरान उनका पक्ष नहीं सुना गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की प्रारंभिक जांच और संसद में सांसदों की एकजुटता ने उनकी स्थिति को कमजोर कर दिया है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने उन्हें इस्तीफा देने की सलाह दी थी, लेकिन जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देने या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने से इनकार कर दिया।
आगे की राह
यह मामला अब संसद की जांच समिति के गठन की ओर बढ़ रहा है। यदि समिति जस्टिस वर्मा को दोषी पाती है, तो संसद में मतदान के बाद उन्हें पद से हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया न केवल जस्टिस वर्मा के भविष्य को प्रभावित करेगी, बल्कि यह न्यायपालिका की जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए एक ऐतिहासिक मिसाल भी कायम कर सकती है। यह घटना न्यायिक प्रणाली में सुधार और भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।



