नई दिल्ली: मानव सभ्यता की प्रगति ने पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला है। इसका एक चौंकाने वाला प्रमाण हाल ही में सामने आया है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, पिछले दो सौ वर्षों में बनाए गए बांधों (Dams) ने पृथ्वी की घूर्णन धुरी को लगभग एक मीटर तक खिसका दिया है। यह खुलासा जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स जर्नल में प्रकाशित एक शोध में किया गया है, जिसने इंसानी गतिविधियों के पृथ्वी पर पड़ने वाले गहरे प्रभावों को उजागर किया है।
पृथ्वी का बदलता संतुलन
पृथ्वी कभी स्थिर नहीं रहती; यह लगातार अपनी धुरी पर घूमती रहती है। हम उत्तर और दक्षिण ध्रुवों को अचल मानते हैं, लेकिन वास्तव में ये ध्रुव भी धीरे-धीरे अपनी स्थिति बदलते रहते हैं। पहले इस बदलाव को प्राकृतिक कारणों जैसे ग्लेशियरों के पिघलने, टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल और समुद्री जलस्तर में वृद्धि से जोड़ा जाता था। लेकिन इस नए अध्ययन ने एक अनपेक्षित कारक को सामने लाया है: मानव निर्मित बांध।
वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी की बाहरी ठोस परत इसके नीचे मौजूद पिघले हुए मैग्मा पर तैरती है। जब सतह पर भारी मात्रा में द्रव्यमान, जैसे बांधों में जमा पानी या विशाल बर्फ की चट्टानें, एकत्र होता है, तो यह संतुलन बिगड़ जाता है। इससे पृथ्वी की ठोस परत हिलने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप ध्रुव अपनी मूल स्थिति से खिसक जाते हैं। इस घटना को वैज्ञानिक ‘ट्रू पोलर वॉन्डर’ कहते हैं, यानी पृथ्वी की घूर्णन धुरी का अपनी जगह से हटना। इसे समझने के लिए एक घूमती हुई गेंद का उदाहरण लें: यदि आप गेंद के एक हिस्से पर वजन डाल दें, तो वह संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी धुरी से थोड़ा हट जाएगी।
बांधों का प्रभाव
अध्ययन के अनुसार, 1835 से 2011 के बीच विश्व भर में लगभग 6,800 बड़े बांध बनाए गए। इन बांधों में जमा पानी के द्रव्यमान ने पृथ्वी की धुरी को लगभग 1.13 मीटर (लगभग 3.7 फीट) तक खिसका दिया है। इतना ही नहीं, इस जल संचय ने वैश्विक समुद्री जलस्तर को लगभग 21 मिलीमीटर तक कम कर दिया। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रमुख शोधकर्ता नताशा वलेनसिक के अनुसार, जब हम बांधों में पानी रोकते हैं, तो यह न केवल समुद्रों से जल की मात्रा कम करता है, बल्कि पृथ्वी के द्रव्यमान वितरण को भी प्रभावित करता है। इससे ध्रुवों की स्थिति बदलती है और समुद्री जलस्तर पर भी असर पड़ता है।
ऐतिहासिक बदलाव
शोध से पता चलता है कि यह बदलाव दो चरणों में हुआ। 1835 से 1954 तक, अधिकांश बांध उत्तरी अमेरिका और यूरोप में बनाए गए, जिसके कारण उत्तरी ध्रुव रूस और एशिया की ओर लगभग 20 सेंटीमीटर खिसक गया। इसके बाद, 1954 से लेकर अब तक, विशेष रूप से एशिया और पूर्वी अफ्रीका में बड़े पैमाने पर बांध निर्माण हुआ, जिसने ध्रुव को पश्चिमी अमेरिका और दक्षिणी प्रशांत महासागर की ओर लगभग 57 सेंटीमीटर तक खिसकाया। इन दोनों चरणों को मिलाकर, ध्रुव कुल मिलाकर 113 सेंटीमीटर तक अपनी स्थिति से हट चुका है।
समुद्री जल स्तर पर प्रभाव
बांधों का प्रभाव केवल ध्रुवों तक सीमित नहीं है। इन संरचनाओं ने समुद्री जलस्तर को भी प्रभावित किया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 20वीं सदी में समुद्री जलस्तर औसतन 1.2 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से बढ़ा, लेकिन बांधों में जल संचय के कारण इसका एक हिस्सा कम हो गया। 1900 से 2011 के बीच, बांधों की वजह से समुद्री जलस्तर में लगभग 0.86 इंच की कमी आई। यह कमी भले ही ग्लेशियरों के पिघलने से होने वाली वृद्धि की तुलना में छोटी लगे, लेकिन जलवायु परिवर्तन और भविष्य के समुद्री जलस्तर की गणनाओं के लिए यह महत्वपूर्ण है।
बड़े बांधों का योगदान
अध्ययन में यह भी पाया गया कि ध्रुवीय खिसकाव और समुद्री जलस्तर में कमी का अधिकांश प्रभाव दुनिया के 6,000 सबसे बड़े बांधों से आया है। छोटे बांधों का प्रभाव नगण्य रहा। यह दर्शाता है कि विशाल जलाशयों ने पृथ्वी की संरचना और संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला है।
भविष्य के लिए चेतावनी
यह शोध एक बार फिर इंसानी गतिविधियों के पर्यावरण और पृथ्वी की संरचना पर पड़ने वाले गहरे प्रभावों को रेखांकित करता है। भले ही एक मीटर का ध्रुवीय खिसकाव छोटा लगे, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव जलवायु मॉडल, समुद्री जलस्तर और यहां तक कि भूकंपीय गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है। यह अध्ययन हमें चेतावनी देता है कि हमें अपनी महत्वाकांक्षाओं को प्रकृति के साथ संतुलित करने की आवश्यकता है, ताकि हमारी धरती का नाजुक संतुलन बरकरार रहे।



