नई दिल्ली: भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून हर वर्ष जून से लेकर सितंबर तक की अवधि में आता है, जो कृषि, जल संसाधनों और पूरे आर्थिक ढांचे के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होता है। इस साल 2025 का मानसून कई मामलों में असाधारण रहा। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि कुल मिलाकर मानसून सामान्य से कहीं ज्यादा मजबूत रहा, और देश के ज्यादातर हिस्सों में भरपूर वर्षा हुई। लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में वर्षा की कमी ने क्षेत्रीय असंतुलन को उजागर किया।
देश भर में बारिश का कुल लेखा-जोखा
2025 में जून से सितंबर तक की मानसून अवधि में पूरे भारत में औसत 108 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई, जो लंबी अवधि के औसत (एलपीए) से ऊपर है। इसे ‘सामान्य से अधिक’ की कैटेगरी में रखा गया। राष्ट्र स्तर पर कुल 937.2 मिलीमीटर बारिश हुई, जो 2001 के बाद पांचवीं सबसे ऊंची मात्रा है और 1901 से अब तक की 38वीं सबसे बड़ी रिकॉर्डिंग। क्षेत्रवार देखें तो उत्तर-पश्चिम भारत में 127 प्रतिशत, मध्य भारत में 115 प्रतिशत और दक्षिणी प्रायद्वीप में 110 प्रतिशत बारिश हुई। वहीं, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में सिर्फ 80 प्रतिशत वर्षा रिकॉर्ड हुई, जो 1901 के बाद दूसरी सबसे कम है।
मानसून की शुरुआत और समाप्ति
इस साल मानसून का आगमन तय समय से पहले हुआ। अंडमान-निकोबार द्वीपों में 13 मई को ही बादल बरसने लगे, जबकि सामान्य रूप से यह 19 मई के आसपास आता है। केरल में मानसून 24 मई 2025 को पहुंच गया, जो तय तारीख 1 जून से पूरे आठ दिन पहले था। पूरे देश को मानसून ने 29 जून तक कवर कर लिया, जबकि सामान्यत: यह 8 जुलाई तक होता है। वापसी भी जल्दी शुरू हुई, और 14 सितंबर को पश्चिमी राजस्थान से मानसून की विदाई दर्ज की गई।
मासिक आधार पर वर्षा का विश्लेषण
महीनों के हिसाब से जून में 109 प्रतिशत, जुलाई और अगस्त में 105 प्रतिशत, जबकि सितंबर में 115 प्रतिशत तक बारिश हुई। यानी चारों महीनों में वर्षा सामान्य या उससे ज्यादा रही, खासतौर पर सितंबर सबसे ज्यादा बरसाती महीना साबित हुआ।
क्षेत्रीय स्तर पर वर्षा का असंतुलन
देश के 36 मौसमी सबडिविजनों में से दो (करीब 10 प्रतिशत क्षेत्र) में अत्यधिक वर्षा हुई, 12 (35 प्रतिशत क्षेत्र) में अधिक वर्षा, 19 (46 प्रतिशत क्षेत्र) में सामान्य स्तर की बारिश देखी गई। सिर्फ तीन सबडिविजनों—अरुणाचल प्रदेश, असम-मेघालय और बिहार (9 प्रतिशत क्षेत्र)—में वर्षा कम रही। इससे पता चलता है कि ज्यादातर भारत में बारिश अच्छी रही, लेकिन पूर्वोत्तर और बिहार जैसे इलाकों में कमी ने स्थानीय चुनौतियां खड़ी कीं।
मौसमी सिस्टम और उनकी भूमिका
2025 के मानसून में सात डिप्रेशन विकसित हुए, जिनमें से एक गहरा डिप्रेशन बना। कुल 69 दिनों तक लो प्रेशर सिस्टम सक्रिय रहे, जो सामान्य 55 दिनों से काफी ज्यादा है। इन सिस्टमों की वजह से पश्चिमी, मध्य और प्रायद्वीपीय भारत में मजबूत वर्षा हुई।
चरम मौसमी घटनाएं
मानसून के दौरान कई जगहों पर भारी (115.6 मिमी से ज्यादा) और अति भारी (204.5 मिमी से ज्यादा) बारिश हुई। सबसे ज्यादा प्रभाव कोकण-गोवा, कर्नाटक के तटीय इलाकों, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, तेलंगाना, बिहार और ओडिशा में पड़ा। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भीषण वर्षा से बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाएं आईं।
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कृषि और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
यह मानसून वर्षा पर निर्भर कृषि क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हुआ, जहां औसत 122 प्रतिशत बारिश हुई। इससे खरीफ फसलों जैसे चावल, मक्का, सोयाबीन और कपास को बड़ा फायदा मिला। जलाशयों का स्तर ऊंचा होने से रबी सीजन की सिंचाई के लिए बेहतर हालात बने। आईएमडी का पूर्वानुमान भी काफी हद तक सटीक रहा—केरल में आगमन की भविष्यवाणी बिल्कुल सही, जबकि जून-सितंबर के लिए 105-106 प्रतिशत एलपीए का अनुमान था और वास्तविक 108 प्रतिशत हुआ। सिर्फ जुलाई में थोड़ी गड़बड़ी रही, लेकिन बाकी महीने सही रहे। कुल मिलाकर, 2025 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से मजबूत रहा। उत्तर-पश्चिम, मध्य और दक्षिणी भारत में भरपूर वर्षा से किसानों को राहत मिली और जल संसाधन मजबूत हुए। लेकिन पूर्वोत्तर और बिहार में कमी ने चिंताएं बढ़ाईं। समय से पहले आगमन और जल्दी विदाई इस साल की अनोखी बात रही। यह सब जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को दिखाता है, जहां वर्षा की असमानता और चरम घटनाएं बढ़ रही हैं।



