नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा लाए जा रहे प्रस्तावित सीएपीएफ (CAPF) रेगुलेशन बिल को लेकर विवाद गहरा गया है। केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद अब ऑल एक्स पैरा मिलिट्री फोर्सेज वेलफेयर एसोसिएशन (AAPWA) ने इस विधेयक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को राजधानी में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अर्धसैनिक बलों के पूर्व दिग्गज अधिकारियों ने इस बिल को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं और इसे गृह विभाग की स्टैंडिंग कमेटी को भेजने की मांग की।
10 लाख जवानों के मनोबल पर पड़ेगा विपरीत असर
एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि यह विधेयक बीएसएफ (BSF), सीआरपीएफ (CRPF), आईटीबीपी (ITBP), सीआईएसएफ (CISF) और एसएसबी (SSB) के लगभग 12,500 अधिकारियों और उनके अधीन कार्यरत करीब 10 लाख कर्मचारियों की सेवा शर्तों, नेतृत्व संरचना और मनोबल को प्रभावित कर सकता है। पूर्व अधिकारियों ने तर्क दिया कि ये बल देश की सीमा सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियानों और आपदा प्रबंधन में अग्रिम पंक्ति में रहते हैं। ऐसे में इनके नेतृत्व ढांचे में किसी भी प्रकार का असंतुलन सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी का आरोप
प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व अधिकारियों ने कहा कि साल 2019 में सीएपीएफ अधिकारियों को संगठित ग्रुप-A सर्विस (OGAS) का दर्जा दिया गया था, जिसे साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी मान्यता दी। कैबिनेट द्वारा अनुमोदित होने के बावजूद इसके पूर्ण क्रियान्वयन में देरी पर सवाल उठाए गए हैं। एसोसिएशन का आरोप है कि प्रस्तावित विधेयक सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के प्रभाव को कम कर सकता है और बलों में मौजूद पदोन्नति की देरी व संरचनात्मक असमानताओं को और अधिक बढ़ा सकता है।
दिग्गज अधिकारियों की मौजूदगी
इस महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस में अर्धसैनिक बलों का नेतृत्व कर चुके कई बड़े नाम शामिल हुए, जिनमें BSF के पूर्व एडीजी एसके सूद, एचआर सिंह और पूर्व आईजी एमएस मल्ही, ITBP के पूर्व एडीजी एसके चौधरी, SSB के पूर्व आईजी विकास चंद्रा, बिनोद नायक और पीके गुप्ता और साथ में CRPF के पूर्व आईजी केके शर्मा। इन सभी अधिकारियों ने एक सुर में कहा कि सीएपीएफ में सीमित नेतृत्व अवसर पहले से ही चिंता का विषय रहे हैं और नया कानून इस संकट को और गहरा कर सकता है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर जल्दबाजी के बजाय संसदीय समितियों के साथ विस्तृत चर्चा की जाए।



