नई दिल्ली: 13 अक्टूबर को पूरी दुनिया अंतर्राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस मना रही है, जिसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र ने 1989 में की थी। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को आपदाओं के प्रति जागरूक बनाना है, ताकि समझ आए कि ये घटनाएं सिर्फ प्रकृति की मार नहीं, बल्कि हमारी कमजोर तैयारियों और खराब विकास मॉडल का नतीजा भी हैं। आज के दौर में यह दिवस हमें याद दिलाता है कि जोखिमों को पहले से कम करके ही हम सुरक्षित भविष्य रच सकते हैं।
आपदाओं का बढ़ता खतरा
आज आपदाएं केवल मौसम की चालाकी नहीं रह गईं। जलवायु परिवर्तन, बेतरतीब शहरों का फैलाव और लापरवाह विकास योजनाएं इन्हें और घातक बना रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में सूखे की घटनाएं 29 प्रतिशत तक उछल चुकी हैं। एशिया में बाढ़ से सबसे ज्यादा जानें गई हैं और आर्थिक चोट भी गहरी पड़ी है। उष्णकटिबंधीय तूफानों से ही सालाना औसतन 119.5 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है, जो विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है।/
अर्थव्यवस्था पर गहरा आघात
ये आपदाएं सिर्फ जीवनों को निगलती नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थतंत्र को भी झकझोर देती हैं। प्रत्यक्ष नुकसान ही सालाना 202 अरब डॉलर का है, लेकिन पर्यावरण क्षति और अप्रत्यक्ष प्रभाव जोड़ें तो यह आंकड़ा 2.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाता है। गरीब देशों में संसाधनों की कमी से पुनर्वास मुश्किल हो जाता है, जबकि अमीर राष्ट्रों को अरबों का बोझ उठाना पड़ता है। चिंताजनक यह है कि आपदा रोकथाम पर निवेश नाममात्र का है, सार्वजनिक बजट का मुश्किल से 1 प्रतिशत ही इससे जुड़ता है। 2019 से 2023 के बीच विकास सहायता परियोजनाओं में केवल 2 प्रतिशत ने जोखिम न्यूनीकरण को जगह दी और मानवीय मदद भी घट रही है।
निजी क्षेत्र की अनदेखी
दुनिया के 75 प्रतिशत निवेश निजी कंपनियां करती हैं, लेकिन ज्यादातर जलवायु जोखिमों को अनदेखा कर देती हैं। इससे नुकसान की संभावना बढ़ती है और समाज की सहनशक्ति कमजोर पड़ती है। व्यवसायों को समझना होगा कि जोखिम-मुक्त निवेश ही लंबे समय का फायदा देते हैं।
रास्ते निकालने के उपाय
सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) इस दिशा में एक मजबूत वैश्विक समझौता है, जो देशों को जोखिम-केंद्रित विकास अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इसमें पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाना शामिल है, जैसे जंगलों से बाढ़ रोकना, मैंग्रोव से तूफानों का मुकाबला और आर्द्रभूमियों से सूखे प्रबंधन। स्थानीय लोग, सरकारें और निजी क्षेत्र मिलकर इको-डीआरआर (पारिस्थितिकी आधारित जोखिम न्यूनीकरण) को अपनाएं। 2025 की थीम भी यही कहती है: सरकारें और एजेंसियां डीआरआर में ज्यादा निवेश करें, सभी परियोजनाएं जोखिम-सचेत और जलवायु-अनुकूल हों।
भविष्य को बचाने की पुकार
आपदाएं प्रकृति की नहीं, हमारी लापरवाही की उपज हैं—वे वर्षों की प्रगति को एक झटके में उजाड़ देती हैं। अगर आज डीआरआर में निवेश न किया, तो कल की पीढ़ियां भारी मूल्य चुकाएंगी। सरकारें, व्यवसाय और समाज एकजुट होकर तैयारी करें, क्योंकि आपदाओं को रोका न सका तो कम से कम नुकसान को तो सीमित कर ही सकते हैं।



