नई दिल्ली: महर्षि दयानंद सरस्वती की 200वीं जयंती और आर्य समाज की 150 वर्षों की समाज सेवा के उपलक्ष्य में 31 अक्टूबर को रोहिणी, नई दिल्ली में आर्यन सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा। खास बात यह है कि ‘ज्ञान ज्योति महोत्सव’ के रूप में मनाए जा रहे इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भाग लेंगे।
दयानंद सरस्वती के सुधारवादी विचारों की प्रासंगिकता पर होगी चर्चा
इस सम्मेलन के दौरान भारत और विदेशों में स्थित आर्य समाज के प्रतिनिधियों को एक साथ लाया जाएगा। साथ ही महर्षि दयानंद सरस्वती के सुधारवादी विचारों और आर्य समाज की वैश्विक प्रासंगिकता को रेखांकित किया जाएगा। इस सम्मेलन के दौरान “सेवा के 150 स्वर्णिम वर्ष” शीर्षक से एक विशेष प्रदर्शनी भी आयोजित की जाएगी, जिसमें शिक्षा, सामाजिक सुधार और आध्यात्मिक उत्थान के क्षेत्र में आर्य समाज के उल्लेखनीय योगदान को प्रदर्शित किया जाएगा।
कार्यक्रम का उद्देश्य महर्षि दयानंद सरस्वती की सुधारवादी और शैक्षिक विरासत का सम्मान करना, आर्य समाज की 150 वर्षों की सेवा का उत्सव मनाना और विकसित भारत 2047 की परिकल्पना के अनुरूप वैदिक सिद्धांतों व स्वदेशी मूल्यों के वैश्विक प्रसार को प्रोत्साहित करना है।
इसको भी पढ़ें: ADMM-Plus बैठक से मिलेगी भारत की एक्ट ईस्ट नीति को मजबूती
वैदिक पुनर्जागरण के प्रणेता थे महर्षि दयानंद
महर्षि दयानंद सरस्वती (1824–1883) भारत के महान संत, समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक थे। उनका जन्म 12 फरवरी 1824 को टंकारा (वर्तमान गुजरात) में हुआ था। उनका मूल नाम मूलशंकर तिवारी था। वे जीवनभर सत्य, वेद और राष्ट्रोत्थान के लिए समर्पित रहे।
महर्षि दयानंद ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव, बाल विवाह, मूर्तिपूजा, स्त्री असमानता जैसे कुरीतियों का विरोध किया और वेदों को सत्य ज्ञान का मूल स्रोत बताया। उनका प्रसिद्ध नारा था वेदों की ओर लौटो। इसके अलावा महर्षि दयानंद ने 10 अप्रैल 1875 को मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की।



