माओवादी : कमजोर पड़ते ही दुबक जाते, करते अनुकूल समय का इंतजार

खतरनाक माओवादियों का इतिहास रहा है। खुद को कमजोर पाकर सरेंडर कर देते हैं लेकिन मौका देखते ही खूंखार बन जाते हैं लिहाजा इनसे खतरा बरकार रहता है। वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र नाथ राय की माओवादियों पर रिपोर्ट

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नई दिल्ली: गृहमंत्री अमित शाह ने पूरे देश से मार्च 2026 तक नक्सलवाद को खत्म करने की घोषणा की है। इसी को लक्ष्य रखकर लाल आतंक के खिलाफ अभियान को तेज कर दिया गया है। माओवादी पलायन की ओर हैं लेकिन यह अभियान उनके लिए पलायन होगा या समाप्ति का कारण बनेगा यह अभी कहना उपयुक्त नहीं होगा। माओवादी कभी आमने-सामने की लड़ाई नहीं लड़ते, जब खुद को कमजोर पाते हैं, वे भाग जाते हैं। पुलिस पर पीछे से वार करते हैं। यही कारण है कि इनके पूर्ण समाप्ति हो जाएगी, यह कहना कठिन होगा। अभी खुद को कमजोर पा रहे हैं। इस कारण सत्तर के दशक की तरह ये लोग अभी अपने कार्यक्रम स्थगित करने के फिराक में लगे हैं।

यह हमें ध्यान देना चाहिए कि इससे पहले 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी गांव से शुरू हुआ यह आंदोलन 1971 में सरकार द्वारा ऑपरेशन स्टीपलचेज लगातार 45 दिनों तक चलाने के बाद दो दशक तक माओवाद समाप्ति की ओर रहा। इस दौरान भी नगण्य गतिविधियां रह गयी थीं, लेकिन नब्बे के दशक में फिर अपना फन फैलाने लगा और 2004 में यह चरम पर था।
आइए पहले इस लाल आतंक का इतिहास समझते हैं। इसे विचार न कहकर “लाल आतंक” कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। ऐसा कहने का कारण है इसमें विचार कुछ नहीं, सिर्फ लोगों में भय पैदाकर वसूली करना प्रमुख काम रह गया है। माओवादी समूचे तंत्र को हिंसक तरीके से उखाड़ के अपनी विचारधारा के अनुरूप नयी व्यवस्था को स्थापित करना चाहते हैं। माओवादियों की विचारधारा है कि राजनैतिक सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है और राजनीति रक्तपात रहित युद्ध है और युद्ध रक्तपात युक्त राजनीति।
नक्सलवाद के संस्थापक चारू मजूमदार और कानू सान्याल रहे। इसकी सफलता और असफलता का अंदाज इसी से लगा सकते हैं कि कानू सान्याल ने जहां से नक्सलवाद की शुरूआत हुई थी, वहीं पर 23 मार्च 2010 को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बारे में जानने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। 1968 में नक्सलवाड़ी में उग्र चरमपंथी आंदोलन माओवाद की शुरुआत जमिंदारों के अत्याचार के खिलाफ हुई। असम के रहने वाले कानू सान्याल भी संस्थापक सदस्यों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) से 25 किलोमीटर दूर सेफ्तुल्लाजोटे गांव में नक्सल आंदोलन की शुरुआत अपने घर से ही की थी।

जहां से शुरु किये आंदोलन उसी घर में लगा ली थी फांसी

23 मार्च 2010 को उसी घर में उनका शव फंदे से लटका हुआ पाया गया। कहा जाता है कि माओवाद का आंदोलन अपने पथ से भटक जाने के कारण वे दुखी थे। सान्याल बुढ़ापे से संबंधित हृदय-फुफ्फुसीय बीमारियों से भी पीड़ित थे। अपनी मृत्यु के समय वे मूल पार्टी के कई अलग-अलग समूहों के विलय से बनी नई सीपीआई (एमएल) के महासचिव थे।
सिद्धांत सिर्फ किताबों, काम आततायी का
जिस तरह से इस समय अधिकांश राजनीतिक दलों की स्थापना किसी विशेष विचारधारा से प्रभावित होकर की जाती है। उसका बेस आम जन के बीच बताया जाता है। निश्चय ही वह उद्देश्य देखने में ठीक हो सकता है, लेकिन पार्टी कभी उस विचारधारा को नहीं अपनाती। वह सिर्फ किताबों में रह जाता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आम आदमी पार्टी है, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से निकली लेकिन सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के आरोप भी उसी पर लगे।
वही स्थिति माओवाद की है, बल्कि कहा जाय कि उससे भी विभत्स रूप माओवाद में देखने को मिलता है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जल, जंगल और जमीन के लिए लड़ाई का नारा देने वाले माओवादी नेता स्वयं इसका उपभोग करने में संलिप्त हो गये। आदिवासी समाज को जंगल का हक दिलाने के नाम पर सशस्त्र आंदोलन के वाले आतंक का पर्याय बने माओवादी सबसे ज्यादा आदिवासी समाज का ही नुकसान किये।

2004 नक्सलियों का था स्वर्णीम काल

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) या भाकपा माओवादी दो खूंखार नक्सली संगठनों के आपसी विलय के बाद हुई। माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर यानी एमसीसी और भाकपा माले, पीपुल्सवार ने साल 2004 में 21 सितम्बर को आपस में विलय कर लिया। वैसे विलय की आधिकारिक घोषणा उसी साल 14 अक्टूबर को की गयी। विलय के बाद तदर्थ केन्द्रीय कमेटी बनी, जिसका महासचिव पीपुल्स वार नेता गणपति को बनाया गया। उनका सही नाम मुप्पला लक्ष्मणा राव है।

पांच सौ ज्यादा हथियार लूट लिये थे माओवादी

छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की सीमाओं से लगे कोरापुट ज़िले के मुख्यालय पर इस वर्ष 6 फरवरी को सीपीआई (एमएल) पीपुल्सवार की पीपुल्स गुरिल्ला आर्मी (पीजीए) के दस्तों ने एक साथ 10 ठिकानों पर हमले किए। हमले के दौरान पूरा ज़िला एक तरह से नक्सली कब्जे में था। इस हमले में 5 सौ से ज़्यादा अलग-अलग हथियार और 25 हजार से ज़्यादा कारतूस पीपुल्सवार के हाथ लगे।

2009 में भारत सरकार ने घोषित किया आंतकी संगठन

22 जून,2009 को भारत सरकार ने भाकपा माओवादी को आतंकवादी संगठन घोषित करते हुए इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसके बाद भाकपा माओवादी कायर्कर्ताओं पर यूएपीए के तहत कार्रवाई शुरु हो गयी। आंध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा जैसे राज्यों में पहले से हीं संगठन पर प्रतिबंध लागू था। देशव्यापी प्रतिबंध लगने के बाद रैलियों, आमसभा और दूसरे सार्वजनिक कार्यक्रमों पर रोक रहेगी साथ ही उनके कार्यालय और बैंक अकाउंट भी जब्त होने लगे। गृह मंत्रालय में उच्चस्तरीय बैठक के बाद माओवादियों को प्रतिबंधित करने का फैसला लिया गया।

स्पेशल ब्रांच के डीआईजी ने कहा

इस संबंध में नक्सल प्रभावित कांकेर जिले में एस.पी. रह चुके और वर्तमान में स्पेशल ब्रांच के तेज-तर्रार डीआईजी एम.एल कोटवानी का कहना है कि नक्सलियों ने सबसे ज्यादा प्रताड़ित आदिवासी समाज को ही किया है। अभी कुछ दिन पूर्व तक आदिवासी समाज के लोग इनके चक्कर में फंसकर दोनों तरफ से मार खा रहे थे। उन माओवादी नेताओं का दबाव माओवादी बनने के लिए बनता था। यदि नहीं बने तो उनके द्वारा मारे जाते थे। यदि माओवादी बन गये तो फोर्स के हाथों। आदिवासी समाज के लोग कभी उच्च पदों पर नहीं रहे और मुठभेड़ में अधिकांश छोटे के माओवादी ही सामने ढकेले जाते, जिन्हें जान से हाथ धोना पड़ता। बड़े पदों पर बैठे माओवादी ऐश करते थे। हार्डकोर माओवादियों में नीचे के अधिकांश सिपाही आदिवासी समाज से ही रहे हैं। माओवादी हमेशा उन्हें धमकी माओवादी बनने के लिए दबाव बनाते रहे हैं। आदिवासियों की स्थिति कुछ समय तक यह थी कि दोनों तरफ से उनके गर्दन पर तलवार लटकी रहती थी।

खुद बच्चों को पढ़ाते विदेश में, आदिवासी क्षेत्रों में नहीं खोलने देते स्कूल

उनका कहना है कि बड़े स्तर के माओवादियों बच्चे विदेश में पढ़ते हैं, जबकि माओवादी प्रभावित क्षेत्रों माओवादी स्कूल नहीं खोलने देते। इसके पीछे उनका मकसद है कि यदि आदिवासी समाज विकसित हो जाएगा तो फिर वे माओवादियों के बहकावे व डर से भयभीत नहीं होगा। एम.एल कोटवानी का कहना है कि अधिकांश जन अदालत के नाम पर आदिवासी समाज की हत्या तालिबानी तरीके से करके भय पैदा करना और आदिवासी समाज को भयभीत कर उनसे अवैध वसूली करना ही सिर्फ माओवादियों का उद्देश्य रहा है। आदिवासी समाज की रक्षा का कथित आवरण ओढ़कर आदिवासी समाज का ही विनाश करने की सोच रखना सबसे बड़ा मजाक है।

जमींदारों के खिलाफ लड़ाई के नाम खड़ा माओवाद के संस्थापक ही जमींदार थे

बात 2016 की है, जब मैं कांकेर था। एक साथी शुक्ला जी थे। वे जनताना सरकार के सदस्य थे या नहीं, यह तो सीधा-सीधा कुछ नहीं कह सकते, लेकिन लाल आतंक के विचारों से जरूर प्रभावित थे। वे हर वक्त जल, जंगल और जमीन पर आदिवासी समाज के अधिकार की बात किया करते थे। वे स्वयं उप्र से जाकर कांकेर में बसे थे। एक बार ऐसे ही चर्चा शुरु हो गयी। उन्होंने कहा कि यह उच्च वर्गीय लोगों और सरकार का सीधा-सीधा आदिवासी समाज पर किया जा रहा अत्याचार है। जंगल को सिर्फ आदिवासी समाज के लिए छोड़ देना चाहिए। मैंने कहा कि भाई साहब बेहतर होता कि आप स्वयं ऐसा कर एक बेहतर उदाहरण देते। आप स्वयं आदिवासी क्षेत्र में बाहर से आकर उनके हक पर कब्जा किये हुए हैं। उनके नाम पर लड़ाई की बात कहकर आप सिर्फ उन्हें मुर्ख बना रहे हैं। इसके बाद वे चुप हो गये। यह सिर्फ शुक्ला जी की ही बात नहीं है।
अधिकांश माओवादी नेता सवर्ण हैं। आदिवासी समाज के लोग नीचे स्तर पर पदाधिकारी हैं। मौत आदिवासी समाज के हक में आती है। अवैध वसूली आदिवासी समाज के लोग करते हैं और उसे ऊंच्च पदों पर बैठे ऊंची बिरादरी के लोग करते हैं। यही नहीं माओवादी आंदोलन जमींदारों और सरकार के खिलाफ रक्तरंजित विद्रोह है, लेकिन इसके संस्थापक चारू मजूमदार खुद जमींदार परिवार से थे। उनके पिता बीरेश्वर मजूमदार एक स्वतंत्रता सेनानी और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की दार्जिलिंग जिला समिति के अध्यक्ष थे

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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