SC-ST के सशक्तिकरण के लिए केंद्र और राज्य के बीच तालमेल जरूरी

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का मानना है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के सशक्तिकरण के लिए केंद्र व राज्य की तालमेल जरूरी है। तभी योजनाएं फलदाई होंगी।

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नई दिल्ली: SC-ST के सशक्तिकरण के लिए केंद्र और राज्य के बीच तालमेल जरूरी है। सरकारों को कल्याणकारी योजनाएं समाज के अंतिम व्यक्ति, विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों तक पहुंच सकें। ये बातें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आज भुवनेश्वर में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर संसद और राज्य विधानमंडलों की समितियों के अध्यक्षों के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में ये बातें कहीं।

उन्होंने कहा कि ऐसे समन्वित प्रयासों से ही विकास और प्रगति का सच्चा लाभ मिल सकता है। उन्होंने प्रत्येक राज्य विधानसभा की ओर से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए समर्पित समितियों के गठन की आवश्यकता पर बल दिया बिरला ने आज भुवनेश्वर में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर संसद और राज्य विधानमंडलों की समितियों के अध्यक्षों के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में ये बातें कहीं।

गठन में भूमिका निभाने का आह्वान 

उन्होंने कहा कि संसद में पहले से ही कल्याणकारी उपायों की सक्रिय निगरानी के लिए इस तरह की समितियां हैं लेकिन कुछ राज्यों में ऐसी संस्थागत व्यवस्थाओं का अभाव जमीनी स्तर पर निगरानी की प्रभावशीलता को सीमित करता है। बिरला ने कहा कि ऐसी समितियां न केवल नीतियों और योजनाओं के कार्यान्वयन की नियमित समीक्षा को सुगम बनाएंगी बल्कि यह भी सुनिश्चित करेंगी कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों की चिंताओं का समयबद्ध तरीके से समाधान किया जाए। उन्होंने राज्य विधानमंडलों से इन समितियों के गठन में अग्रणी भूमिका निभाने का आह्वान किया।

योजनाओं की समीक्षा और सुधार के लिए अहम

उन्होंने कहा कि भारत ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों को मज़बूत करने और यह सुनिश्चित करने के लिए व्यापक सुधार किए हैं कि वे वर्तमान आकांक्षाओं के अनुरूप हों। उन्होंने कहा कि समितियां बजटीय प्रावधानों की सूक्ष्मता से जांच करके कल्याणकारी योजनाओं के प्रदर्शन की समीक्षा करके और सुधार सुझाकर इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। 

  • यह विस्तृत जांच न केवल शासन में पारदर्शिता बढ़ाती है बल्कि जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही भी सुनिश्चित करती है।
  • उनकी रचनात्मक सिफारिशें अक्सर सरकारों को अधिकारों का पुनर्मूल्यांकन करने, उनके अनुरूप योजनाएं बनाने और नीतियों को सुव्यवस्थित करने में मार्गदर्शन प्रदान करती हैं ताकि वे वंचित समुदायों की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित कर सकें। 
  • सम्मेलन के दौरान गहन चर्चाओं के माध्यम से प्रतिभागियों ने इस बात पर विचार-विमर्श किया कि संवैधानिक प्रावधानों, बजटीय आवंटन और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है, जिससे वे वास्तव में सशक्त और आत्मनिर्भर बन सकें।

रोडमैप में विकास के सभी पहलुओं को शामिल किया जाए

बिरला ने कहा कि इस तरह के रोडमैप में विकास के सभी पहलुओं सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक को शामिल किया जाना चाहिए ताकि 2047 तक भारत बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के स्वप्न एक समतामूलक, न्यायसंगत और समावेशी समाज को साकार कर सके। उन्होंने कहा कि यह केवल आकांक्षा नहीं बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है। उन्होंने कहा कि इन समितियों से प्राप्त सिफारिशों को आलोचना के बजाय सुधार के लिए रचनात्मक मार्गदर्शन के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब सरकारें और समितियां इसी भावना से मिलकर काम करती हैं तो परिणाम हमेशा अधिक स्थायी और प्रभावी होते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा और प्रौद्योगिकी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सशक्तिकरण के प्रेरक हैं। इन साधनों का उपयोग समुदायों और राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए करने का आह्वान किया।

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