नई दिल्ली: 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में भिखारियों की कुल संख्या लगभग 4,13,670 थी, जिसमें 2,21,673 पुरुष और 1,91,997 महिलाएं शामिल थीं। ये लोग मंदिरों, ट्रैफिक सिग्नलों, रेलवे स्टेशनों और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर भीख मांगते हुए दिखाई देते हैं। यह संख्या देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को दर्शाती है, जहां कई लोग जीविका के लिए भीख मांगने पर निर्भर हैं। हालांकि, यह आंकड़ा पुराना है, और वर्तमान में यह संख्या और अधिक हो सकती है। भिखारी समाज का एक ऐसा वर्ग है, जो अक्सर गरीबी और बेरोजगारी के कारण इस पेशे की ओर बढ़ता है।
किस राज्य में हैं सबसे ज्यादा भिखारी?
2011 की जनगणना के आधार पर, पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 81,244 भिखारी हैं, जो भारत के किसी भी राज्य से ज्यादा है। इसके बाद उत्तर प्रदेश (65,835 भिखारी), आंध्र प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान का स्थान आता है। पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में घनी आबादी और शहरीकरण के कारण भिखारियों की संख्या अधिक हो सकती है। इन राज्यों में बड़े शहर, जैसे कोलकाता और लखनऊ, भिखारियों के लिए भीड़-भाड़ वाली जगहें उपलब्ध कराते हैं, जहां उनकी कमाई की संभावना बढ़ जाती है।
भिखारियों की मासिक कमाई
भिखारियों की आय स्थान और शहर के आधार पर भिन्न होती है। कोई आधिकारिक सर्वे उनकी आय का सटीक आंकड़ा नहीं देता, लेकिन अनुमान के अनुसार, एक सामान्य भिखारी प्रतिदिन 100-500 रुपये कमा सकता है, यानी मासिक 3,000-15,000 रुपये। बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई या कोलकाता में यह राशि 500-1,000 रुपये प्रतिदिन हो सकती है, जो मासिक 15,000-30,000 रुपये तक पहुंचती है।
कुछ भिखारी, जैसे मुंबई के भरत जैन, रोजाना 2,000-2,500 रुपये कमाते हैं, जिससे उनकी मासिक आय 60,000-75,000 रुपये होती है। कोलकाता की लक्ष्मी दास (30 हजार रुपये), पटना की सरवतिया देवी (50 हजार रुपये), और मुंबई के कृष्ण कुमार गीते (45,हजार रुपये) जैसे भिखारी भी अपनी ऊंची कमाई के लिए चर्चित हैं।
उल्लेखनीय अमीर भिखारी
कई भिखारी ऐसे भी है जिन्होंने अपनी कमाई को सूझ-बूझ के साथ निवेश करके संपत्ति बनाई हैं। इसका उदाहरण भरत जैन है जिन्होंने मुंबई में फ्लैट और दुकानें बनाई है, जिससे वह किराए से अतिरिक्त आय कमा लेते हैं। इसी तरह, सरवतिया देवी बीमा प्रीमियम चुकाती हैं, जो उनकी आर्थिक समझ को दर्शाता है।



