Climate Change: सूखे से बढ़ता यौन हिंसा का खतरा

एक हालिया अंतरराष्ट्रीय शोध के अनुसार, लंबे समय तक चलने वाले सूखे का सीधा संबंध किशोरियों के खिलाफ यौन हिंसा के बढ़ते मामलों से है।

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नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण होने वाले गंभीर सूखे केवल खेती और पानी की कमी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका असर युवा लड़कियों और महिलाओं के जीवन पर भी गहरा पड़ रहा है। एक हालिया अंतरराष्ट्रीय शोध के अनुसार, लंबे समय तक चलने वाले सूखे का सीधा संबंध किशोरियों के खिलाफ यौन हिंसा के बढ़ते मामलों से है। यह शोध ऑस्ट्रेलिया के कर्टिन विश्वविद्यालय और किड्स रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा किया गया और इसके परिणाम प्लोस ग्लोबल पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।

सूखे का असर: किशोरियों पर बढ़ता खतरा
शोध में सामने आया है कि 8 से 43 महीनों तक चलने वाले गंभीर सूखे की स्थिति में 13 से 24 वर्ष की आयु की किशोरियों के खिलाफ यौन हिंसा का जोखिम 21% तक बढ़ जाता है। यह अध्ययन दक्षिण अमेरिका, उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी यूरोप के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 35,000 से अधिक किशोरियों के आंकड़ों पर आधारित है। ये आंकड़े 2013 से 2019 के बीच एकत्र किए गए थे। शोध से पता चलता है कि सूखा न केवल पर्यावरणीय संकट पैदा करता है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता को भी बढ़ाता है, जिसका सबसे ज्यादा असर कमजोर समुदायों की लड़कियों पर पड़ता है।

सूखा और हिंसा: एक गहरा संबंध
लंबे समय तक सूखे के कारण पानी और भोजन की कमी, आर्थिक तंगी और पलायन जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इन परिस्थितियों में लड़कियों को पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे वे असुरक्षित हो जाती हैं। इसके अलावा, संसाधनों की कमी के कारण परिवारों में बाल विवाह को बढ़ावा मिलता है, जो यौन हिंसा के जोखिम को और बढ़ा देता है। सामुदायिक तनाव और सामाजिक अस्थिरता भी इन खतरों को और गंभीर बनाती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली लड़कियां पर्यावरणीय तनाव से सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं, क्योंकि उनकी आजीविका और संसाधन सीधे तौर पर प्रकृति पर निर्भर होते हैं।

जलवायु परिवर्तन का भविष्य: बढ़ता खतरा
शोध में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में सूखे की घटनाएं और अधिक तीव्र और बार-बार होंगी। इससे महिलाओं और किशोरियों के खिलाफ यौन हिंसा का खतरा और बढ़ सकता है। अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि छोटी अवधि के सूखे भी इस खतरे को कम नहीं करते। शोधकर्ताओं का कहना है कि पर्यावरणीय संकटों के सामाजिक प्रभावों को समझने के लिए हिंसा की परिभाषा को और व्यापक करना होगा, क्योंकि यह केवल अंतरंग संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी फैल रही है।

प्राकृतिक आपदाएं और हिंसा का चक्र
पिछले शोध भी दर्शाते हैं कि प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़, तूफान और भूस्खलन के बाद घरेलू हिंसा में वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि ऐसी आपदाओं के दो साल बाद तक साथी द्वारा हिंसा के मामले बढ़ जाते हैं। इंडोनेशिया और पेरू में हुए शोध में महिलाओं ने पानी की कमी को भी हिंसा का एक रूप बताया, जो उनके स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है।

समाधान की दिशा में कदम
शोधकर्ताओं ने सरकारों और नीति-निर्माताओं से आग्रह किया है कि जलवायु नीतियों में महिलाओं और किशोरियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। ऐसी नीतियां बनाई जाएं जो पर्यावरणीय संकटों के साथ-साथ सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का भी समाधान करें। इसके लिए पानी और संसाधनों तक सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करना, बाल विवाह को रोकने के लिए जागरूकता बढ़ाना और सामुदायिक स्तर पर सुरक्षा के उपाय करना जरूरी है।
इस शोध ने यह स्पष्ट किया है कि जलवायु संकट केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक ढांचे को भी प्रभावित करता है। महिलाओं और किशोरियों की सुरक्षा के लिए व्यापक और संवेदनशील नीतियों की आवश्यकता है, ताकि पर्यावरणीय और सामाजिक खतरों का एक साथ सामना किया जा सके।

Aprajita Sharan

aprajitasharan@gmail.com

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