नई दिल्ली: अल्जाइमर रोग (एडी) से दुनिया में हजारों लोग परेशान हैं लेकिन इसकी दवाएं बेहद सीमित मात्रा में मौजूद हैं। इससे पूरी तरह राहत नहीं मिलती है। अब आशा की किरण निकली है। अब इसका और बेहतर उपचार मिलेगा, क्योंकि भारत के शोधकर्ताओं ने दवा विकसित की है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (JNCASR) के शोधकर्ताओं ने एमआईआरएनए-आधारित चिकित्सीय दवा विकसित की है जो न्यूरोइन्फ्लेमेशन और फेरोप्टोसिस को रोकने के लिए केएलएफ4 को लक्षित करती है।
अल्जाइमर पीड़ित दिमाग में Altered miRNAs की स्टडी की
शोधकर्ताओं ने अल्जाइमर पीड़ित दिमाग में Altered miRNAs की स्टडी की। यह रोग के शीघ्र, विशिष्ट और सटीक उपचार के लिए बायोमार्कर के रूप में एमआईआरएनए की क्षमता की भी जांच की। मधु रमेश और प्रोफेसर थिमैया गोविंदराजू ने एडी विकास और प्रगति में शामिल नए एमआईआरएनए की खोज के लिए डबल ट्रांसजेनिक एडी माउस मॉडल का उपयोग किया। विभिन्न एमआईआरएनए की पहचान की जो सामान्य मस्तिष्क की तुलना में एडी मस्तिष्क में परिवर्तित हो जाते हैं और ये संभावित रूप से रोग को ट्रिगर कर सकते हैं।
अध्ययन में क्या मिला
- एनएआर मॉलिक्यूलर मेडिसिन में प्रकाशित अध्ययन में एडी में परिवर्तित विभिन्न एमआईआरएनए–एमआरएनए मार्ग नेटवर्क का खुलासा किया है, जो संभावित रूप से दवा विकास के लिए लक्ष्य के विभिन्न मार्गों को प्रकट कर सकता है।
- उन्होंने एमआईआर-7ए में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जो केएलएफ4 प्रोटीन को लक्षित करता है और एडी में शामिल विभिन्न जीन अभिव्यक्तियों का एक प्रमुख नियामक है।
- एमआईआर-7ए-केएलएफ4 एक्सिस तंत्रिका-सूजन को नियंत्रित करता है जो एडी विकृति का एक प्रमुख कारण है। यह एक्सिस एडी में शामिल आयरन-मेडिएटेड न्यूरोनल सेल डेथ मेकेनिज़्म, जिसे फेरोप्टोसिस कहा जाता है, को भी नियंत्रित करता है।
यह है औधषि
अध्ययन में शामिल शोधकर्ता प्रोफेसर टी गोविंदराजू ने कहा, “वर्तमान अध्ययन केएलएफ4 लक्ष्यीकरण के माध्यम से न्यूरोइन्फ्लेमेशन और फेरोप्टोसिस को नियंत्रित करने में एमआईआर-7ए की नियामक भूमिका को उजागर करके अल्जाइमर रोग के बारे में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
उन्होंने एमआईआर-7ए को सावधानीपूर्वक संशोधित करके एक ऐसा प्रतिरूप संश्लेषित किया जिसने केएलएफ4 के स्तर को महत्वपूर्ण रूप से कम कर दिया और रोग संबंधी विकृतियों से राहत दिलाई। उन्होंने एमआईआर-7ए-केएलएफ4 एक्सिस के औषधीय मॉड्यूलेशन के लिए एक छोटे अणु और प्राकृतिक उत्पाद, होनोकिओल का उपयोग किया।
क्या है होनेकिओल
होनोकिओल एक प्राकृतिक उत्पाद है जो मैगनोलिया पेड़ की छाल और सीड कॉन्स में पाया जाता है। यह केएलएफ4 को लक्षित करके एडी में शामिल तंत्रिका-सूजन और फेरोप्टोसिस कोशिका मृत्यु को बाधित करता है। यह दर्शाता है कि एमआईआर-7ए-केएलएफ4 एक्सिस एडी के लिए एक नया लक्ष्य है और इस रोग के लिए बेहतर उपचार विकसित करने हेतु और अधिक अन्वेषण की आवश्यकता है।
मणिपाल स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज, मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन (एमएएचई) के एजिंग रिसर्च विभाग के प्रो. गिरीश गंगाधरन ने कहा कि इस शोध से पता चलता है कि एमआईआर-7ए, केएलएफ4 में अवरोध उत्पन्न करता है, सूजन (एनएफ-केबी, आईएनओएस, एनएलआरपी3) और फेरोप्टोसिस-संबंधी (लिपिड हाइड्रोपरॉक्साइड्स का आयरन-निर्भर संचय) मार्गों को नियंत्रित करके न्यूरोनल क्षति को कम करता है। होनोकिओल जैसे रक्त-मस्तिष्क बैरियर-परमियेबल कम्पाउंड के साथ इस एक्सिस को लक्षित करना चिकित्सीय क्षमता प्रदर्शित करता है।
दैनिक मूल्यांकन के साथ, विकसित एमआईआरएनए प्रतिरूप और लघु अणु, यदि सुरक्षित और प्रभावी सिद्ध होते हैं, तो संभावित रूप से एडी का उपचार कर सकते हैं, जिससे रोगियों और देखभाल करने वालों, दोनों को लाभ होगा। अध्ययन में एडी में अपरेगुलेटेड और डाउनरेगुलेटेड एमआईआरएनए के पैनल का अनावरण किया गया, जो एडी के प्रारंभिक क्लिनिकल डायग्नोसिस के लिए संभावित बायोमार्कर के रूप में काम कर सकता है।
इन परिणामों से इस रोग से उत्पन्न व्यापक सामाजिक-आर्थिक बोझ में उल्लेखनीय कमी आएगी तथा न्यूरोइन्फ्लेमेशन और फेरोप्टोसिस को लक्षित करने के जरिए न्यूरोडीजेनेरेटिव और न्यूरोइन्फ्लेमेटरी विकारों के उपचार का मार्ग प्रशस्त होगा।
काले बिच्छू के खतरनाक डंक राज से उठा पर्दा
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी उन्नत अध्ययन संस्थान (आईएएसएसटी) के वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पूर्वी और दक्षिणी भारत के अपेक्षाकृत अल्पज्ञात काले बिच्छू की स्वदेशी प्रजाति, हेटरोमेट्रस बंगालेंसिस (एचबी) के विष विवरण का पहला व्यापक विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि काले बिच्छू के डंक के खतरे की वजह उसके द्वारा शरीर में छोड़े गए विष में मौजूद आठ विभिन्न प्रोटीन परिवारों (क्रमिक रूप से संबंधित प्रोटीनों के समूह) के 25 अलग-अलग विषाक्त पदार्थ हैं।
स्पेक्ट्रोमेट्री और जैव-रासायनिक विश्लेषणों से एचबीवी के 8 प्रोटीन परिवारों के 25 प्रमुख विषैले तत्वों की पहचान हुई। शोधकर्ताओं ने स्विस एल्बिनो चूहों (प्रयोगशाला शोध में व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले सफेद चूहे) पर औषधीय प्रभाव का अध्ययन कर पाया कि ये रसायन प्रणालीगत विषाक्तता, यकृत एंजाइमों में वृद्धि, अंगों को नुकसान और पूर्व-सूजन की वजह बनते हैं।



