नई दिल्ली: आज के डिजिटल युग में, बिजली के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। हम अपने स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) तक सब कुछ बैटरी पर चला रहे हैं। फिलहाल, लिथियम-आयन बैटरियां दुनिया पर राज कर रही हैं, लेकिन इनकी अपनी सीमाएं हैं—ये महंगी हैं, इनमें आग लगने का खतरा होता है और इनके लिए कच्चे माल (लिथियम) की भारी कमी है।
यहीं पर प्रवेश होता है ‘एक्वियस जिंक-आयन बैटरी’ (AZIBs) का। ये पानी आधारित बैटरियां हैं, जो सुरक्षित हैं, सस्ती हैं और पर्यावरण के लिए भी कम हानिकारक हैं। लेकिन, हर अच्छी चीज की तरह इसमें भी एक ‘अड़चन’ थी—जिसे वैज्ञानिक भाषा में डेंड्राइट, जंग (Corrosion), और हाइड्रोजन इवोल्यूशन (HER) कहते हैं।
समस्या क्या थी? क्यों बार-बार खराब हो रही थीं बैटरियां?
जब हम जिंक-आयन बैटरी का उपयोग करते हैं, तो इलेक्ट्रोलाइट में मौजूद पानी के अणु जिंक की सतह पर हमला करते हैं। इससे दो मुख्य समस्याएं होती हैं:
- जंग लगना: जिंक की सतह धीरे-धीरे खराब होने लगती है।
- जिंक डेंड्राइट का बनना: बैटरी के अंदर जिंक के छोटे-छोटे नुकीले कांटे (डेंड्राइट) उगने लगते हैं, जो बैटरी को अंदर से ‘शॉर्ट सर्किट’ कर देते हैं।
- हाइड्रोजन गैस: पानी के कारण बैटरी के अंदर गैस बनने लगती है, जिससे बैटरी फूल जाती है या उसकी क्षमता कम हो जाती है।
नया चमत्कार: BDIM – बैटरी का नया बॉडीगार्ड
मोहाली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST) के वैज्ञानिकों ने इस समस्या को सुलझाने के लिए एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसे ‘इंटरफेस इंजीनियरिंग’ कहा जाता है। उन्होंने BDIM (1,3-bis (1,3-dicarboxypropyl)-1H-imidazole-3-ium chloride) नामक एक एडिटिव बनाया है।
यह कैसे काम करता है? इसे एक उदाहरण से समझते हैं: मान लीजिए आपकी बैटरी एक सड़क है और पानी के अणु ‘ट्रैफिक’ हैं जो सड़क को खराब कर रहे हैं। BDIM यहाँ एक ‘ट्रैफिक पुलिस’ या ‘सुरक्षा कवच’ की तरह है।
- यह जिंक की सतह पर जाकर मजबूती से चिपक जाता है।
- यह पानी के अणुओं को जिंक की सतह के करीब आने से रोकता है।
- जब पानी जिंक से टच ही नहीं होगा, तो न जंग लगेगी और न ही डेंड्राइट बनेंगे।
कैसे तैयार किया गया यह जादुई मिश्रण?
वैज्ञानिकों ने बहुत ही सटीक और सरल रसायनों का उपयोग किया:
- मुख्य सामग्री के रूप में ग्लूटामिक एसिड, सोडियम हाइड्रॉक्साइड, ग्लायोक्सल, फॉर्मलडिहाइड और एसिटिक एसिड का उपयोग किया गया।
- इन्हें नाइट्रोजन के वातावरण में 70 डिग्री सेल्सियस पर 24 घंटे गर्म किया गया।
- अंत में, इसे क्रिस्टलीय पाउडर (BDIM) के रूप में प्राप्त किया गया। यह पूरी प्रक्रिया न केवल वैज्ञानिक रूप से सटीक है, बल्कि इसे भविष्य में बड़े कारखानों में बनाना भी काफी आसान है।
अल्ट्रामिक्रोइलेक्ट्रोड (UME) और हाई-टेक जांच
इस रिसर्च की सबसे खास बात यह थी कि वैज्ञानिकों ने इसे परखने के लिए ‘अल्ट्रामिक्रोइलेक्ट्रोड (UME)’ का इस्तेमाल किया। यह 50 माइक्रोमीटर से भी छोटा एक उपकरण है जो यह देखने में मदद करता है कि बैटरी के अंदर चार्ज का आदान-प्रदान (Charge Transfer) कैसे हो रहा है। इसके साथ FSCV (Fast-Scan Cyclic Voltammetry) तकनीक का उपयोग करके उन्होंने जिंक के जमने की पूरी प्रक्रिया को पहली बार इतने करीब से समझा।
आम जनता और उद्योगों के लिए इसके मायने:
- सस्ता बिजली भंडारण: सौर ऊर्जा को स्टोर करना अब महंगा नहीं रहेगा। यह तकनीक ग्रिड-स्केल स्टोरेज (पूरे शहर की बिजली स्टोर करने वाले प्लांट) के लिए गेम-चेंजर है।
- बेहतर इलेक्ट्रिक वाहन: कम कीमत में लंबी रेंज वाली और सुरक्षित इलेक्ट्रिक कारें अब सपना नहीं होंगी।
- मेंटेनेंस में कमी: बैटरी की लाइफ बढ़ने का मतलब है कि आपको बार-बार इन्वर्टर या अन्य उपकरणों की बैटरी बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
- ग्रीन एनर्जी का सपना: सस्टेनेबल एनर्जी की ओर भारत का कदम और भी मजबूत होगा।
निष्कर्ष: ऊर्जा का नया सवेरा
डॉ. रमेंद्र सुंदर डे के नेतृत्व में INST की इस टीम ने यह सिद्ध कर दिया है कि अगर ‘स्मार्ट इंजीनियरिंग’ का प्रयोग किया जाए, तो महंगी धातुओं (जैसे लिथियम) के बिना भी शक्तिशाली बैटरियां बनाई जा सकती हैं। यह शोध न केवल ‘ACS Electrochemistry’ जैसे प्रतिष्ठित जर्नल में प्रकाशित हुआ है, बल्कि यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है।



