नई दिल्ली: साहित्यिक जगत में अक्सर अनुभव और उम्र को ज्ञान का पैमाना माना जाता है, लेकिन उज्बेकिस्तान की एक नन्हीं शोधकर्ता ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है।
समरकंद के एक छोटे से गांव सरोय की रहने वाली 13 वर्षीय छात्रा बिनाफ्शा बाजारोवा द्वारा लिखित मोनोग्राफ “द स्टडी ऑफ जुल्फियस क्रिएटिव वर्क अब्रॉड” का हाल ही में भारत में विमोचन हुआ। यह पुस्तक उज्बेकिस्तान की महान कवयित्री जुल्फिया (जुल्फिया खानिंम) के अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक योगदान और शांति के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता पर केंद्रित है।
भारत और उज्बेक संस्कृति का अटूट संगम
इस पुस्तक में जुल्फिया और भारत के बीच के गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है।
लेखिका बिनाफ्शा बताती हैं कि जुल्फिया ने 1956 में दिल्ली में आयोजित ‘एशियाई लेखक सम्मेलन’ में भाग लिया था, जहां उनकी मुलाकात भारतीय साहित्य के दिग्गजों जैसे अमृता प्रीतम और मुल्क राज आनंद से हुई थी। जुल्फिया के भारतीय काव्य चक्र ‘मुशायरा’ (1958) ने न केवल भारत की सुंदरता को उज्बेक पाठकों तक पहुंचाया, बल्कि उन्हें 1968 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों प्रतिष्ठित ‘जवाहरलाल नेहरू अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार’ भी दिलाया।
शांति और नारीवाद की बुलंद आवाज
बाजारोवा का शोध यह स्पष्ट करता है कि जुल्फिया केवल एक कवयित्री नहीं, बल्कि एक ‘सांस्कृतिक राजदूत’ थी। शीत युद्ध के दौर में उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से उपनिवेशवाद का विरोध किया और एफ्रो-एशियाई एकजुटता का समर्थन किया।
उन्हें 1970 में काहिरा में ‘लोटस प्राइज’ से सम्मानित किया गया, जिसे उन्होंने प्रसिद्ध भारतीय कवि हरिवंश राय बच्चन के साथ साझा किया था। इसके अलावा, जुल्फिया ने ‘साओदत’ पत्रिका की संपादिका के रूप में लगभग 30 वर्षों तक महिलाओं के अधिकारों और उनकी शिक्षा के लिए अनुकरणीय कार्य किया।
सादगी में छिपी वैश्विक शक्ति
पुस्तक में जुल्फिया की चुनिंदा कविताओं जैसे “यू आर राइट, माई हार्ट” और “स्टार” का गहरा विश्लेषण किया गया है। लेखिका के अनुसार, जुल्फिया की ताकत उनकी सादगी में थी।
उन्होंने खुबानी के फूलों और सफेद कबूतरों जैसे कोमल प्रतीकों का उपयोग करके युद्ध की विभीषिका के बीच शांति और पुनर्जन्म का संदेश दिया। आठवीं कक्षा की छात्रा बिनाफ्शा बाज़ारोवा, जिनके पिता सेना में हैं और माता संगीत शिक्षिका हैं, उज्बेकिस्तान की उस नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अपनी जड़ों से जुड़ी हैं।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के विशेषज्ञों द्वारा अनुशंसित यह पुस्तक सिद्ध करती है कि जुल्फिया की विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी आधी सदी पहले थी।
समीक्षक : संतोष पटेल



