नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Trump-Putin Alaska meeting) 15 अगस्त को अलास्का में आमने-सामने होंगे। इस बैठक का मकसद यूक्रेन में तीन साल से चल रही जंग को रोकना है। अगर बात बन गई, तो ये मुलाकात इतिहास रच सकती है। ये पहली दफा होगा जब दोनों नेता अमेरिकी धरती पर मिलेंगे। शुरू में रूस ने UAE को जगह सुझाई थी, लेकिन ट्रंप ने अलास्का चुना, एक ऐसा राज्य जो कभी रूस का हिस्सा था। आइए जानते हैं, रूस ने अलास्का को अमेरिका के हाथों क्यों बेचा और महज 45 करोड़ रुपये में इतनी विशाल भूमि कैसे हाथ लगी।
रूस के परमाणु बेस से महज 80-100 किमी दूर अलास्का
अलास्का रूस से सिर्फ 88 किलोमीटर की दूरी पर है, जो इसे रणनीतिक रूप से खास बनाता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि पुतिन के लिए यहां मिलना सुविधाजनक हो सकता है। अलास्का से रूस के सबसे करीबी सैन्य अड्डे 80 से 100 किमी दूर हैं। ये बेस चुकोतका इलाके में हैं, बेरिंग स्ट्रेट के उस पार। यहां रूसी वायुसेना के ठिकाने और निगरानी केंद्र हैं, जहां परमाणु हथियारों की मौजूदगी की आशंका है। ऐसे में ये बैठक सुरक्षा और सुविधा दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण है।
राजस्थान से पांच गुना बड़ा, कभी था रूस का ‘स्वर्ग’
अलास्का का फैलाव करीब 17 लाख वर्ग किलोमीटर है—भारत के सबसे बड़े राज्य राजस्थान (3.42 लाख वर्ग किमी) से ठीक पांच गुना। 18वीं सदी में रूसियों ने यहां कदम रखा, फर व्यापार के लिए बस्तियां बसाईं। लेकिन 125 साल बाद, 30 मार्च 1867 को रूस ने इसे अमेरिका को 72 लाख डॉलर (तब के 45 करोड़ रुपये) में सौंप दिया। वो दौर था जब अलास्का को ‘रूसी स्वर्ग’ कहा जाता था, लेकिन आज ये अमेरिका का अभिन्न अंग है।
रूसी विदेश मंत्री का आइडिया, जार ने दी मंजूरी
अलास्का बेचने की सोच रूस के तत्कालीन विदेश मंत्री अलेक्जेंडर गोर्चाकोव के मन में आई। अमेरिकी राष्ट्रपति एंड्र्यू जॉनसन ने उन्हें मनाया। फिर गोर्चाकोव ने जार अलेक्जेंडर द्वितीय को राजी किया। रूसी अवाम इसके खिलाफ थी, लेकिन जार ने दस्तखत कर दिए। ये फैसला रूस की आर्थिक तंगी और सामरिक मजबूरियों से उपजा था।
ब्रिटिश खतरे और आर्थिक दबाव ने मजबूर किया
रूस को डर था कि युद्ध छिड़ा तो ब्रिटेन की सहायता से अमेरिका अलास्का छीन सकता है। अर्थव्यवस्था डगमगा रही थी, और इतना दूर इलाका संभालना मुश्किल। सबसे बड़ी समस्या थी सीमाओं की रक्षा—अलास्का इतना बड़ा था कि हजारों सैनिक लगाने पड़ते। फर व्यापार भी घट रहा था, सो बेचना ही बेहतर लगा।
अमेरिका में उड़ा मजाक, कहा ‘सिवार्ड की मूर्खता’
जब अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम सेवर्ड ने खरीद की घोषणा की, तो लोगों ने ठहाके लगाए। इतनी ठंडी, बंजर जमीन 72 लाख में? इसे ‘सेवर्ड की मूर्खता’ करार दिया गया। राष्ट्रपति जॉनसन को भी ‘पागल’ कहा। लेकिन वक्त ने साबित किया कि ये सौदा सोने की खान था।
जार की हत्या और अलास्का कनेक्शन?
जार अलेक्जेंडर द्वितीय का जन्म 1818 में हुआ, 1855 में गद्दी संभाली। अलास्का बिक्री के बाद उन पर कई हमले हुए। आखिर 1881 में सेंट पीटर्सबर्ग में बम विस्फोट में उनकी मौत हो गई। कुछ इतिहासकार इसे बिक्री से जुड़े राजनीतिक असंतोष से जोड़ते हैं, हालांकि रूस ने कभी कबूला नहीं।
रूस को आज भी सताता है अफसोस
2014 में क्रीमिया हथियाने के वक्त रूस में गाने गूंजे—पुतिन एक दिन अलास्का वापस लेंगे। आज अलास्का तेल, सोना, हीरे से लबालब है। ये अमेरिका का ‘खजाना’ है, जहां से प्राकृतिक संसाधन बहते हैं। रूस को लगता है, गलती हो गई।
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अमेरिका की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ
अलास्का अमेरिका के लिए सोने की मुर्गी है। यहां से 20% तेल आता है, गैस भंडार अपार। 1950s में सोने-हीरे की खदानें मिलीं। मछली उद्योग और पर्यटन से करोड़ों कमाई। हर साल लाखों सैलानी आते हैं। ट्रंप-पुतिन की ये मुलाकात अलास्का को फिर सुर्खियों में ला रही है, जहां इतिहास और वर्तमान टकरा रहे हैं।



