नई दिल्ली: रूस ने एक बार फिर यूक्रेन के साथ बातचीत के जरिए युद्ध (Russia Ukraine War) समाप्त करने की इच्छा जाहिर की है, लेकिन साफ किया है कि उसके घोषित लक्ष्यों से कोई समझौता नहीं होगा। रविवार को क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) ने बार-बार यूक्रेन से बातचीत के माध्यम से शांतिपूर्ण तरीके से युद्ध समाप्त करने का आह्वान किया है, लेकिन यह प्रक्रिया आसान नहीं है।
पेस्कोव ने स्पष्ट किया कि रूस की प्राथमिकता अपने सैन्य और रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करना है, जो पहले से निर्धारित हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने मॉस्को को 50 दिनों की समयसीमा देते हुए या तो युद्धविराम पर सहमत होने या सख्त प्रतिबंधों के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है।
क्षेत्रीय नियंत्रण और नाटो सदस्यता पर रूस की सख्त शर्तें
क्रेमलिन ने कहा है कि अगर किसी तरह की शांति वार्ता होती है, तो यूक्रेन को पहले उन चार क्षेत्रों से हटना होगा, जिन पर रूस ने 2022 में कब्जा करने का दावा किया था। हालांकि, इन इलाकों पर अब तक रूस का पूर्ण नियंत्रण नहीं हो पाया है।
इसके अलावा, रूस यह भी चाहता है कि यूक्रेन नाटो (North Atlantic Treaty Organization) में शामिल होने के अपने प्रयासों को पूरी तरह से बंद कर दे। साथ ही, अपने रक्षा ढांचे में रूस द्वारा निर्धारित सीमाओं का पालन करे। लेकिन यूक्रेन और उसके पश्चिमी सहयोगी इन मांगों को खारिज कर चुके हैं। पश्चिमी देशों का मानना है कि यह शांति के नाम पर रूस की ओर से जबरदस्ती की जा रही शर्तें हैं।
हमलों में तेजी, सैन्य ठिकानों को बनाया गया निशाना
जहां एक ओर रूस वार्ता की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सैन्य मोर्चे पर उसकी गतिविधियां लगातार तेज हो रही हैं। रूस ने यूक्रेन के प्रमुख सैन्य-औद्योगिक परिसरों को निशाना बनाते हुए बड़ी कार्रवाई की है।
रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन हमलों में हवा, जमीन और समुद्र से दागे गए सटीक हथियारों और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया। मंत्रालय ने दावा किया कि सभी निर्धारित लक्ष्य सफलतापूर्वक नष्ट किए गए हैं।
स्थिति गंभीर, समाधान की राह कठिन
रूस की यह दोहरी रणनीति – एक ओर वार्ता की पेशकश और दूसरी ओर सैन्य दबाव – यह दिखाती है कि मौजूदा हालात में किसी भी शांति समझौते की राह आसान नहीं है। यूक्रेन जहां अपनी संप्रभुता से समझौता करने को तैयार नहीं, वहीं रूस अपने सैन्य हितों को सर्वोपरि मान रहा है।



