तेहरान: होर्मुज़ स्ट्रेट में पिछले एक हफ्ते से अनिश्चितता का माहौल है। ईरान ने एक बार फिर इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते को बंद कर दिया है, जिसके जवाब में अमेरिका ने भी अपनी नौसैनिक घेराबंदी सख्त कर दी है। इस तनाव ने युद्ध के उस पुराने हथियार को फिर से चर्चा में ला दिया है जिसे ‘नेवल ब्लॉकेड’ (Naval Blockade) कहा जाता है।
क्या है विवाद?
एक संक्षिप्त संघर्षविराम के बाद ईरान ने अपना रुख बदलते हुए होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से बंद करने का ऐलान किया है। ईरान का दावा है कि वह अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी के जवाब में यह कदम उठा रहा है। इस बीच, कई व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकरों पर फायरिंग और उन्हें जबरन वापस भेजने की खबरें भी सामने आई हैं।
इतिहास की गवाही: कितनी असरदार रही है नाकाबंदी?
बीबीसी न्यूज़ पर्शियन की रिपोर्ट के अनुसार, इतिहास बताता है कि समुद्री रास्तों को बंद करना किसी देश की कमर तोड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम रहा है, लेकिन इसके परिणाम हमेशा जटिल और कई बार विनाशकारी रहे हैं:
- प्रथम विश्व युद्ध (ब्रिटेन vs जर्मनी): ब्रिटेन की “दूरस्थ नाकाबंदी” के कारण जर्मनी में खाद और भोजन की भारी कमी हो गई थी। इतिहासकारों के मुताबिक, कुपोषण और बीमारियों से लाखों जर्मन नागरिकों की जान गई, जो अंततः जर्मनी की हार का एक बड़ा कारण बना।
- द्वितीय विश्व युद्ध (जापान): अमेरिका के ‘ऑपरेशन स्टार्वेशन’ ने जापान की समुद्री रसद पूरी तरह काट दी थी। चूंकि जापान एक द्वीपीय देश था, उसके पास कोई वैकल्पिक ज़मीनी रास्ता नहीं था, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई।
- क्यूबा मिसाइल संकट (1962): अमेरिका ने इसे ‘क्वारेंटाइन’ का नाम दिया था। यह रणनीति सफल रही क्योंकि इसने सोवियत संघ के साथ परमाणु युद्ध को टालते हुए बातचीत का रास्ता साफ किया।
मानवीय संकट का काला पक्ष
जहाँ एक ओर नाकाबंदी सैन्य और आर्थिक रूप से प्रभावी रही है, वहीं ग़ज़ा और यमन जैसे हालिया उदाहरणों में इसने केवल मानवीय त्रासदी को जन्म दिया है।
- ग़ज़ा: 2007 से जारी इस नाकाबंदी ने अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया, लेकिन हिंसा के चक्र को नहीं रोक सकी।
- यमन: सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन की नाकाबंदी ने हूतियों को रोकने की कोशिश की, लेकिन इसके कारण यमन को दुनिया के सबसे भीषण अकाल और स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़ा।
क्या नौसैनिक नाकाबंदी कितनी असरदार?
इस सवाल का जवाब इतिहास के पन्नों में छिपा है। यह दुश्मन को झुकने पर मजबूर तो कर सकती है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कीमत निर्दोष नागरिक चुकाते हैं। होर्मुज़ के मामले में, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका का यह दबाव ईरान को वार्ता की मेज पर लाता है या संघर्ष को और भड़काता है।



