कृत्रिम मिठास का Environment पर बढ़ता खतरा: नदियों-समुद्रों में फैल रहा ‘जहर’

जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल टॉक्सिकोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन, जिसमें भारत सहित 24 देशों के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का विश्लेषण किया गया, ने कृत्रिम मिठास की मौजूदगी और उनके पर्यावरणीय प्रभावों को उजागर किया है।

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नई दिल्ली: हाल के एक शोध में खुलासा हुआ है कि ‘शुगर-फ्री’ उत्पादों जैसे सॉफ्ट ड्रिंक्स, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों और टूथपेस्ट में उपयोग होने वाली कृत्रिम मिठास अब केवल हमारे भोजन तक सीमित नहीं रही। ये रासायनिक यौगिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स से होते हुए नदियों, झीलों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तक पहुंच रहे हैं। इससे पर्यावरण (Environment) और जलीय जीवों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।

वैश्विक अध्ययन ने खोली हकीकत
जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल टॉक्सिकोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन, जिसमें भारत सहित 24 देशों के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का विश्लेषण किया गया, ने कृत्रिम मिठास की मौजूदगी और उनके पर्यावरणीय प्रभावों को उजागर किया है। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी (UTS) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि ये रासायनिक मिठासें इतनी स्थिर हैं कि सामान्य ट्रीटमेंट प्रक्रियाएं इन्हें पूरी तरह हटा नहीं पातीं। नतीजतन, ये नदियों और समुद्रों में पहुंचकर जल गुणवत्ता और जलीय जीवन को नुकसान पहुंचा रही हैं।

गर्मियों में बढ़ता है खतरा
अध्ययन के अनुसार, सुक्रालोज, सैकरिन, एसेसल्फेम और साइक्लामेट विश्व स्तर पर सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले कृत्रिम स्वीटनर हैं। भारत, अमेरिका, जर्मनी और स्पेन के सीवेज सिस्टम में इनकी मात्रा विशेष रूप से अधिक पाई गई। गर्मियों के महीनों में इन मिठासों की सांद्रता 15 से 35% तक बढ़ जाती है, जबकि चीन में सर्दियों में इनका स्तर चरम पर होता है। अन्य स्वीटनर जैसे नियोटेम, स्टीविया और नियोहेस्पेरिडिन डाइहाइड्रोचाल्कोन (NHDC) भी सीवेज में पाए गए। इन मिठासों की खासियत यह है कि ये मानव शरीर में आसानी से पचती नहीं, जिसके कारण ये अपशिष्ट के रूप में सीवेज सिस्टम में प्रवेश कर जाती हैं और वहां से जलाशयों तक पहुंचती हैं।

कुछ मिठासें हटाना संभव, कुछ असंभव
शोध में यह भी सामने आया कि सैकरिन और साइक्लामेट को उन्नत सीवेज ट्रीटमेंट प्रक्रियाओं से हटाया जा सकता है, लेकिन सुक्रालोज और एसेसल्फेम जैसे स्वीटनर इतने टिकाऊ हैं कि इन्हें हटाना लगभग असंभव है। ये रसायन पर्यावरण में जमा होकर जलीय जीवों के लिए खतरा बन रहे हैं। उदाहरण के लिए, सुक्रालोज जेब्राफिश में जन्मजात दोष पैदा कर सकता है, और सैकरिन की उच्च मात्रा मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। मानव स्वास्थ्य पर भी इनका प्रभाव चिंताजनक है, क्योंकि इन्हें टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर जैसी बीमारियों से जोड़ा गया है।

‘फॉरएवर केमिकल्स’ जैसा खतरा
शोधकर्ता प्रोफेसर ली ने बताया, “सुक्रालोज जैसे स्वीटनर रासायनिक रूप से इतने स्थिर हैं कि ये सामान्य और उन्नत ट्रीटमेंट प्रक्रियाओं को भी पार कर जाते हैं। ये नदियों और समुद्रों में पहुंचकर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाते हैं।” यह स्थिति पीएफएएस जैसे ‘फॉरएवर केमिकल्स’ की तरह है, जो पर्यावरण में लंबे समय तक जमा रहते हैं। कृत्रिम मिठासें भी धीरे-धीरे जल स्रोतों में जमा हो रही हैं, जिससे पीने के पानी और जीवों के लिए खतरा बढ़ रहा है।

समाधान की जरूरत
यह अध्ययन पर्यावरण संरक्षण एजेंसियों और जल प्रबंधन प्राधिकरणों के लिए एक चेतावनी है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कृत्रिम मिठासों के उपयोग को नियंत्रित करने, उनकी निगरानी बढ़ाने और उन्नत ट्रीटमेंट तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है। साथ ही, उपभोक्ताओं को भी प्रोटीन शेक, टूथपेस्ट और अन्य उत्पादों में मौजूद इन मिठासों के बारे में जागरूक होने की जरूरत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सख्त नियम और बेहतर तकनीकों के बिना, ये ‘मिठास का जहर’ पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए एक दीर्घकालिक खतरा बन सकता है।

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