नई दिल्ली। ब्राजील के घने अमेजन वर्षावन के बीच बसे बेलेम शहर में नवंबर के दूसरे पखवाड़े में दुनिया के नेता इकट्ठा हुए थे। संयुक्त राष्ट्र के 30वें जलवायु सम्मेलन, कॉप30 का मकसद था कि वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की दिशा में ठोस कदम। लेकिन सम्मेलन खत्म होने के बाद सवाल वही पुराना है: क्या हासिल हुआ? वैज्ञानिक रिपोर्ट्स की बौछार के बीच वार्ताएं हुईं, वादे हुए, लेकिन जमीन पर बदलाव की हवा अभी भी ठंडी ही लग रही है। आइए, गहराई से देखें कि इस कॉप ने क्या दिया और क्या छोड़ा।
2025: गर्मी का नया रिकॉर्ड, ठंडक की कोई उम्मीद नहीं
सम्मेलन से ठीक पहले विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने एक झटका दिया। 2025 को इतिहास के दूसरे या तीसरे सबसे गर्म साल के रूप में दर्ज किया जा सकता है। 2015 से अब तक के दस सालों में हर साल टॉप-10 गर्मियों की लिस्ट में जगह बना ली। जून 2023 से अगस्त 2025 तक, फरवरी 2025 को छोड़कर हर महीना रिकॉर्ड तोड़ता रहा। महासागरों का तापमान 2024 के रिकॉर्ड को पार कर गया, जो पिछले 20 सालों में सबसे तेज रफ्तार से बढ़ा। इसका असर? समुद्र स्तर की ऊंचाई 1990 के दशक के 2.1 मिलीमीटर सालाना से दोगुनी होकर 4.1 मिलीमीटर पर पहुंच गई। आर्कटिक की सर्दियों की बर्फ सबसे कम, अंटार्कटिक का साल भर औसत से नीचे। हिमालय से लेकर हिमनदों तक हर जगह बर्फ पिघलाव ने समुद्र को 1.2 मिलीमीटर ऊपर धकेला कि 1950 के बाद की सबसे बड़ी हानि। 2025 की आपदाओं ने तांडव मचा दिया कि एशिया-अफ्रीका में बाढ़ें, अमेरिका-यूरोप में जंगल की आग, चक्रवातों ने सैकड़ों जिंदगियां लील लीं। डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा, ये असाधारण तापमान का सिलसिला 1.5 डिग्री लक्ष्य को पार करने की कगार पर ले आया है। लेकिन सदी के अंत तक इसे वापस लाना मुमकिन है कि अगर अभी एक्शन लें।
ग्रीनहाउस गैसें: आसमान छूते स्तर, वादे धुंधले
वायु में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) का स्तर 1750 के 278 पीपीएम से उछलकर 2024 में 423.9 पीपीएम हो गया। सालाना 3.5 पीपीएम की सबसे तेज बढ़ोतरी। मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड भी रिकॉर्ड हाई पर। कुल उत्सर्जन 57.7 गीगाटन सीओ2 समकक्ष तक पहुंचा, जो 2023 से 2.3% ज्यादा। ऊर्जा, उद्योग और जीवाश्म ईंधन इसका 69% जिम्मेदार। वनों की कटाई ने भी नुकसान दोगुना कर दिया, 21% की छलांग। यूएन पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की ‘एमिशन गैप रिपोर्ट’ ने साफ शब्दों में कहा: ऑफ टार्गेट। मौजूदा नीतियां दुनिया को 2100 तक 2.8 डिग्री वार्मिंग की ओर ले जा रही हैं। पेरिस समझौते के 10 साल पूरे, लेकिन 193 देशों में सिर्फ 64 ने नए राष्ट्रिय योगदान (एनडीसी) जमा किए। ये 63% वैश्विक उत्सर्जन कवर करते हैं, लेकिन 2035 तक भी सिर्फ 15% कटौती की, जबकि 1.5 डिग्री के लिए 55% जरूरी। कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन बोलीं, “वादे तीन बार टूटे। अब अतिक्रमण छोटा रखना ही कुंजी है। हर 0.1 डिग्री की बचत नुकसान घटाएगी, खासकर गरीबों के लिए।
बड़े उत्सर्जक: जी20 की जिम्मेदारी, भारत-चीन में तेजी
शीर्ष छह उत्सर्जक चीन, अमेरिका, भारत, ईयू, रूस, इंडोनेशिया ने 2023-24 में सबसे ज्यादा इजाफा किया। जी20 ने कुल बढ़ोतरी का 77% हिस्सा संभाला, जबकि सबसे कम विकसित देशों का सिर्फ 3%। ईयू अकेला जहां उत्सर्जन घटा। एंडरसन की चेतावनी कि जी20 की कार्रवाई तय करेगी भविष्य। रिपोर्ट कहती है, यहां तक कि सबसे आशावादी परिदृश्य में भी 1.9 डिग्री वार्मिंग संभव, सफलता की संभावना सिर्फ 66%। नवीकरणीय ऊर्जा की सस्ती तकनीकें उपलब्ध हैं, लेकिन नीतियां, फंडिंग और सहायता की कमी बाधा। यूएनईपी सुझाव देता है: विकासशील देशों को अरबों डॉलर दें, वित्तीय सिस्टम रीडिजाइन करें। भारत जैसा देश, लंबे तट और बड़ी आबादी के साथ, सबसे ज्यादा खतरे में।
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अनुकूलन का संकट: पैसे की कमी, जान का खतरा
कॉप30 से पहले यूएनईपी की ‘एडॉप्शन गैप रिपोर्ट’ ने निराश किया। 2035 तक विकासशील देशों को बाढ़, सूखा, समुद्र वृद्धि से निपटने के लिए 310-365 बिलियन डॉलर सालाना चाहिए। लेकिन 2023 में सिर्फ 26 बिलियन मिले, 284 बिलियन का गैप। ये 12-14 गुना कम है। यूएन चीफ एंतोनियो गुटेरेस ने कहा, अनुकूलन महंगा नहीं, जिंदगी बचाने वाला निवेश है। कॉप29 का 300 बिलियन लक्ष्य भी कम पड़ता। एंडरसन बोलीं, “अभी न लगाएं तो कल कीमतें आसमान छू लेंगी। सार्वजनिक-निजी फंडिंग बढ़ानी होगी।



