नई दिल्ली: अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) के पूर्व अधिकारी जॉन किरियाको (John Kiriakou) ने पाकिस्तान को लेकर एक सनसनीखेज खुलासा किया है। उन्होंने दावा किया है कि पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ (Pervez Musharraf) ने देश के परमाणु हथियारों का नियंत्रण अमेरिका को सौंप दिया था। किरियाको के मुताबिक, यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि उस समय पाकिस्तान सरकार को डर था कि कहीं आतंकवादी संगठन इन हथियारों पर कब्जा न कर लें।
जॉन किरियाको ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत के दौरान बताया कि 2002 में जब वे पाकिस्तान में तैनात थे, तब उन्हें अनौपचारिक रूप से बताया गया कि पेंटागन पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार पर निगरानी रखता है। उन्होंने कहा, “परवेज मुशर्रफ ने हथियार नियंत्रण संयुक्त राज्य अमेरिका को सौंप दिया क्योंकि उन्हें डर था कि ये परमाणु हथियार गलत हाथों में जा सकते हैं।”
भ्रष्टाचार में डूबा पाकिस्तान
किरियाको ने पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि देश में उस वक्त भ्रष्टाचार चरम पर था। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो (Benazir Bhutto) विदेशों में विलासितापूर्ण जीवन बिता रही थीं, जबकि पाकिस्तान के आम नागरिक गरीबी और भूख से जूझ रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका ने उस समय पाकिस्तान को ‘खरीद’ लिया था। उन्होंने बताया कि मुशर्रफ शासनकाल में अमेरिका ने पाकिस्तान को लाखों डॉलर की सहायता दी — चाहे वह सैन्य हो या आर्थिक विकास के नाम पर।
‘मुशर्रफ ने अमेरिका को जो चाहे करने दिया’
पूर्व CIA अधिकारी ने बताया कि मुशर्रफ के साथ अमेरिका के रिश्ते बेहद घनिष्ठ थे। उन्होंने कहा, “हम मुशर्रफ से हफ्ते में कई बार मिलते थे और वे हमें जो चाहें करने की अनुमति देते थे।” हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि मुशर्रफ के अपने राजनीतिक और सैन्य हित थे। किरियाको के मुताबिक, पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति ने सेना को खुश रखने के लिए भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों को नजरअंदाज किया, लेकिन अमेरिका के साथ आतंकवाद-विरोधी सहयोग का दिखावा जारी रखा।
भारत-पाक तनाव और राजनीतिक संकट
उन्होंने यह भी याद किया कि 2001 के संसद हमले के बाद भारत और पाकिस्तान युद्ध (India-Pakistan Relations) के मुहाने पर थे। उस समय पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति और आतंकवाद के मुद्दों ने हालात को और जटिल बना दिया था। किरियाको ने चिंता जताई कि पाकिस्तान की राजनीति अक्सर सड़कों पर हिंसक प्रदर्शनों का रूप ले लेती है, जहां नेताओं पर हमले और हत्याएं आम हो जाती हैं।
मुशर्रफ की आत्मकथा का जिक्र
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, मुशर्रफ ने अपनी आत्मकथा “इन द लाइन ऑफ फायर” में स्वीकार किया है कि उन्होंने 9/11 हमले के बाद तालिबान का समर्थन छोड़कर विदेश नीति में बड़ा बदलाव किया था। उन्होंने यहां तक लिखा कि एक समय उन्होंने अमेरिका से लड़ने के विकल्प पर भी विचार किया था, लेकिन बाद में अहसास हुआ कि पाकिस्तान उस मुकाबले में टिक नहीं पाएगा।
जॉन किरियाको के इन बयानों ने एक बार फिर पाकिस्तान-अमेरिका संबंधों की असलियत को उजागर किया है। यह साफ करता है कि आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता के डर ने पाकिस्तान को अपनी संप्रभुता तक दांव पर लगाने पर मजबूर कर दिया था।



