नई दिल्ली। ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद वहां आधिकारिक शोक समारोह 4 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। इस कार्यक्रम में दुनिया भर के कई दिग्गज नेता और राजनयिक शामिल होंगे। भारत सरकार की तरफ से बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा इस शोक समारोह में शामिल होने के लिए ईरान जाएंगे।
इस धार्मिक विदाई के बीच लोगों में इस बात को लेकर उत्सुकता है कि शिया इस्लामी परंपरा के अनुसार एक सर्वोच्च धार्मिक गुरु का अंतिम संस्कार किस तरह किया जाता है। आइए जानते हैं गुस्ल, कफन, जनाजा और दफ्न की पूरी प्रक्रिया।
गुस्ल की रस्म
अंतिम संस्कार की शुरुआत ‘गुस्ल’ से होती है, जो मृतक के शरीर को अनिवार्य रूप से पवित्र करने की एक धार्मिक रस्म है। शिया इस्लामी परंपरा के मुताबिक शव को तीन अलग-अलग चरणों में बेहद सावधानी से धोया जाता है। सबसे पहले पानी में कमल या बेर के पत्ते मिलाकर शरीर को साफ किया जाता है। फिर पानी में कपूर मिलाकर शरीर को धोया जाता है। आखिर में बिल्कुल शुद्ध और साफ पानी से अंतिम बार स्नान कराया जाता है।
सफेद कपड़े में लपेटना और 7 हिस्सों पर कपूर
धार्मिक रूप से शुद्ध करने के बाद पार्थिव शरीर को एक सादे, बिना सिले सफेद सूती कपड़े में लपेटा जाता है, जिसे ‘कफन’ कहा जाता है। शिया परंपरा के तहत कफन में मुख्य रूप से कपड़े के तीन टुकड़े शामिल होते हैं। पहला होता है लुत्का, यह कपड़ा शरीर के निचले हिस्से (कमर से नीचे) को ढकता है। फिर कमीज, यह शरीर के ऊपरी हिस्से को ढकने के लिए इस्तेमाल होता है। फिर इजार, यह एक बड़ी चादर होती है, जो सिर से लेकर पैर तक पूरे शरीर को समेट लेती है। कफन पहनाने के दौरान शरीर के उन सात हिस्सों पर विशेष रूप से कपूर लगाया जाता है, जो इस्लाम में सजदे के वक्त जमीन को छूते हैं।
सार्वजनिक विदाई और ‘नमाज-ए-जनाजा’
कफन पहनाने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, पार्थिव शरीर को अंतिम विदाई और सार्वजनिक दर्शन के लिए ले जाया जाता है। इसके बाद एक विशेष प्रार्थना की जाती है, जिसे ‘नमाज-ए-जनाजा’ कहा जाता है। आम दिनों में पढ़ी जाने वाली नमाज के उलट, जनाजे की नमाज में घुटने टेकना या जमीन पर माथा टेकना नहीं होता है। यह पूरी नमाज खड़े होकर पढ़ी जाती है।
दफ्न की रस्म
इसके बाद पार्थिव शरीर को बेहद आदर के साथ कब्र में उतारा जाता है। शिया परंपरा में दफ्न की प्रक्रिया काफी अनूठी होती है। कब्र को इस तरह तैयार किया जाता है कि मृतक का चेहरा इस्लाम के सबसे पवित्र स्थल मक्का की दिशा में रहे। शव को कब्र में रखने के बाद कफन के सिरहाने और पैताने की गांठें खोल दी जाती हैं। चेहरे को थोड़ा जमीन की तरफ झुकाकर मक्का की ओर सीधा किया जाता है।
कब्र को पूरी तरह बंद करने से पहले एक शिया धर्मगुरु ‘तल्कीन’ का पारंपरिक पाठ पढ़ते हैं। इसमें मृतक की आत्मा को इस्लाम के मूलभूत सिद्धांतों, अल्लाह की एकता, पैगंबर साहब और शिया पंथ के पवित्र इमामों के नामों की याद दिलाई जाती है। तल्कीन की इस रस्म के पूरा होने के बाद, लकड़ी के तख्तों या पत्थरों की पट्टियों से कब्र को ऊपर से ढक दिया जाता है और फिर उसे मिट्टी से पूरी तरह भर दिया जाता है।



