नई दिल्ली: दुनिया का सबसे ठंडा और सुदूर महाद्वीप अंटार्कटिका (Antarctica) अब इंसानी हस्तक्षेप से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। वैज्ञानिकों की ताजा चेतावनी है कि यहां तेजी से फैल रहा पर्यटन और शोध कार्य इस बर्फीले इलाके को प्रदूषित करने का बड़ा कारण बन चुका है। यह सब ऐसे वक्त हो रहा है जब जलवायु परिवर्तन पहले से ही अंटार्कटिका की बर्फ की चादर को कमजोर कर रहा है। एक अंतरराष्ट्रीय रिसर्च से खुलासा हुआ है कि जहां-जहां लोगों की आवाजाही बढ़ी, वहां पिछले 40 सालों में भारी धातुओं के सूक्ष्म कणों का स्तर 10 गुना तक उछल गया। इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ अंटार्कटिका टूर ऑपरेटर्स के डेटा बताते हैं कि दो दशक पहले यहां आने वाले सैलानियों की तादाद महज 20 हजार थी, जो अब 1.2 लाख से ज्यादा हो चुकी है।
फॉसिल फ्यूल वाले जहाजों से निकलता जहर
मुश्किल ये है कि ये पर्यटक ज्यादातर फॉसिल फ्यूल से चलने वाले जहाजों से पहुंचते हैं, जो हवा में निकेल, तांबा, जस्ता और सीसा जैसे जहरीले तत्व छोड़ते हैं। रिसर्च के अनुसार, ये प्रदूषक बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया को और तेज कर रहे हैं। नीदरलैंड की ग्रोनिंगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता राउल कोर्डेरो, जो इस स्टडी का हिस्सा थे, बताते हैं कि एक सैलानी की वजह से करीब 100 टन बर्फ पिघल सकती है। टीम ने दक्षिण शेटलैंड द्वीपों से लेकर एल्सवर्थ पहाड़ों तक 2 हजार किलोमीटर के दायरे में बर्फ के सैंपल इकट्ठे किए। इनके परीक्षण से हवा के जरिए जमा होने वाले रसायनों का एक तरह का नक्शा तैयार हुआ, जो इंसानी असर को साफ दिखाता है।
इंसानी दखल से पर्यावरण को कितना नुकसान?
स्टडी में पाया गया कि बर्फ में कणों के स्रोत कई हैं – मिट्टी, समुद्र की लहरें या जीवों की गतिविधियां – लेकिन मानवजनित प्रदूषण की छाप साफ नजर आती है। उत्तरी अंटार्कटिक प्रायद्वीप की बर्फ में भारी धातुएं पाई गईं, जो आमतौर पर ईंधन जलाने या फैक्टरियों से जुड़ी होती हैं। ये वो जगह है जहां रिसर्च सेंटर्स और क्रूज शिप्स सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। सिर्फ पर्यटक ही नहीं, लंबे वैज्ञानिक मिशन भी प्रदूषण फैला रहे हैं – एक प्रोजेक्ट का असर किसी पर्यटक से 10 गुना अधिक हो सकता है।
माइक्रोप्लास्टिक का कहर: प्रति लीटर हजारों कण
कोर्डेरो ने अपनी प्रेस रिलीज में कहा कि नतीजे बताते हैं, अंटार्कटिका में ऊर्जा इस्तेमाल से जुड़ी लोकल एक्टिविटी पर्यावरण को पहले से प्रभावित कर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब यहां की निगरानी मजबूत करने के साथ इंसानी गतिविधियों को टिकाऊ तरीके से मैनेज करना जरूरी है। पहले की रिसर्च में भी अंटार्कटिका की बर्फ में माइक्रोप्लास्टिक मिल चुके हैं। साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट जर्नल की एक स्टडी में प्रति लीटर बर्फ में 73 से लेकर 3,099 तक माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए – इतनी बड़ी संख्या वाकई चौंकाने वाली है।
कुछ अच्छे प्रयास, लेकिन काफी नहीं
रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक पहलुओं का भी जिक्र है, जैसे प्रदूषणकारी ईंधनों पर बैन और इलेक्ट्रिक-हाइब्रिड जहाजों को बढ़ावा। फिर भी, विशेषज्ञ कहते हैं कि अंटार्कटिका बचाने के लिए और सख्त कदम उठाने होंगे। फॉसिल फ्यूल का इस्तेमाल घटाना और रिन्यूएबल एनर्जी को अपनाना इसमें शामिल है। 20 अगस्त को आई एक और स्टडी चेताती है कि अगर जलवायु परिवर्तन से होने वाले असर को नहीं रोका गया तो समुद्री जल स्तर कई मीटर ऊपर आ सकता है, जिसका बोझ आने वाली नस्लों पर पड़ेगा। एक अन्य रिसर्च से पता चला कि अंटार्कटिक इलाका ग्लोबल एवरेज से ज्यादा तेज गर्म हो रहा है। यहां हीटवेव्स अब आम बात हो गई हैं, और इससे हरियाली में पिछले 40 सालों में 10 गुना इजाफा हुआ है – जो जलवायु बदलाव का एक और संकेत है।



